॥ दोहा ॥
श्री गणेशाय नमः
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय रवि देव, जय जय जय शशि देव।
जय जय जय मंगल देव, जय जय जय बुध देव॥
जय जय जय गुरु देव, जय जय जय शुक्र देव।
जय जय जय शनि देव, जय जय जय राहु देव॥
जय जय जय केतु देव, जय जय जय नवग्रह देव।
प्रथमहिं रवि कहँ नावौँ माथा, करहुँ कृपा जन जानि अनाथा।
हे आदित्य दिवाकर भानु, मैं मति मन्द महा अज्ञानु॥
अब निज जन कहँ हरहु कलेशा, दिनकर देव नसावहुँ द्वेषा।
तुम्हरो नाम जपत सुख पाऊँ, आरत हरहुँ प्रभु सब ठाऊँ॥
शशि तुम शीतल शुभ्र प्रकाशा, तुमहिं निरखि मिट जात उदासा।
सोम देव तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
रोग शोक सब दूर भगाओ, मन की इच्छा पूरण कराओ।
चन्द्र देव तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
मंगल देव तुम लाल शरीरा, तुमहिं निरखि मिट जात अधीरा।
अंगारक तुम भूमि सुत देवा, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
ऋण रोग सब दूर भगाओ, मन की इच्छा पूरण कराओ।
मंगल देव तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
बुध देव तुम ज्ञान प्रदाता, तुमहिं निरखि मिट जात अज्ञाता।
सौम्य देव तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
विद्या बुद्धि सब दूर भगाओ, मन की इच्छा पूरण कराओ।
बुध देव तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
गुरु देव तुम ज्ञान प्रदाता, तुमहिं निरखि मिट जात अज्ञाता।
बृहस्पति तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
धन सम्पत्ति सब दूर भगाओ, मन की इच्छा पूरण कराओ।
गुरु देव तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
शुक्र देव तुम सुख प्रदाता, तुमहिं निरखि मिट जात अज्ञाता।
दैत्य गुरु तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
भोग विलास सब दूर भगाओ, मन की इच्छा पूरण कराओ।
शुक्र देव तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
शनि देव तुम दुःख हरण कर्ता, तुमहिं निरखि मिट जात अकर्ता।
सूर्य पुत्र तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
कष्ट क्लेश सब दूर भगाओ, मन की इच्छा पूरण कराओ।
शनि देव तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
राहु देव तुम भय हरण कर्ता, तुमहिं निरखि मिट जात अकर्ता।
सिंहिका सुत तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
शत्रु रोग सब दूर भगाओ, मन की इच्छा पूरण कराओ।
राहु देव तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
केतु देव तुम कष्ट हरण कर्ता, तुमहिं निरखि मिट जात अकर्ता।
चित्रवर्ण तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
विघ्न बाधा सब दूर भगाओ, मन की इच्छा पूरण कराओ।
केतु देव तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
नवग्रह देव तुम सकल जग स्वामी, तुमहिं नमामि नमामि नमामि॥
जो यह पाठ करे मन लाई, सब नवग्रह होयँ सहाई।
धन जन सुत परिवार बढ़ावै, सब सुख भोगि परम पद पावै॥
॥ दोहा ॥
नवग्रह शान्ति पाठ जो करै, सब सुख भोगि परम पद लहै।
यह नवग्रह चालीसा, पढ़ै जो नित चित्त लाई॥
अष्ट सिद्धि नव निधि फल पावै, अन्त समय सुरपुर जावै॥
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গুরুত্ব ও পাঠের নিয়ম
নবগ্রহ চালিসা একটি শক্তিশালী ভক্তিপূর্ণ স্তোত্র, যা বৈদিক জ্যোতিষশাস্ত্র অনুসারে মানব ভাগ্য নিয়ন্ত্রণকারী নবগ্রহ দেবতাকে তুষ্ট করার জন্য পাঠ করা হয়। বিশেষত, যাঁরা কঠিন গ্রহদশা (দশা), অন্তর্দশা (অন্তর্দশা) বা গোচর (গোচর) পরিস্থিতির মধ্য দিয়ে যাচ্ছেন, যেমন শনির কুখ্যাত সাড়ে সাতি, অথবা জন্মছকে গ্রহের দুর্বলতা বা অশুভ প্রভাব (গ্রহ দোষ) থাকাকালীন, তাঁদের জন্য এটি অত্যন্ত গুরুত্বপূর্ণ। গ্রহণ (গ্রহণ) চলাকালীনও এর কথিত নেতিবাচক প্রভাব প্রশমনের জন্য এটি সাধারণত পাঠ করা হয়।
ভক্তগণ সাধারণত প্রতিদিন, অথবা কোনো নির্দিষ্ট গ্রহের বিশেষ তুষ্টির জন্য সেই গ্রহের সংশ্লিষ্ট বারে (যেমন, সূর্যের জন্য রবিবার, শনির জন্য শনিবার) এই চালিসা পাঠ করেন। স্নান সেরে, শুচি শরীর ও মন নিয়ে, প্রায়শই কোনো বেদি বা নবগ্রহের মূর্তির সামনে এই অনুশীলন করা হয়। চালিসা নিজেই একটি সম্পূর্ণ প্রার্থনা হলেও, এটি নবগ্রহের বীজ মন্ত্র বা গায়ত্রী মন্ত্রের মতো অন্যান্য প্রধান মন্ত্রগুলির পরিপূরক হিসেবে কাজ করে, কারণ এটি ভক্তির একটি ব্যাপক ও সহজলভ্য রূপ প্রদান করে। এই পাঠকে কর্মফল (কার্মিক প্রভাব) ভারসাম্যপূর্ণ করতে, অশুভ গ্রহের প্রভাব প্রশমিত করতে এবং শুভ প্রভাব বৃদ্ধি করতে একটি শক্তিশালী আধ্যাত্মিক প্রতিকার (উপায়) হিসেবে গণ্য করা হয়। এটি বিশ্বাস করা হয় যে, ব্যক্তির শক্তিকে মহাজাগতিক শক্তির সাথে সংযুক্ত করে এটি সামঞ্জস্য, শান্তি, সমৃদ্ধি এবং সামগ্রিক কল্যাণ নিয়ে আসে। এর পাঠের সাথে কোনো নির্দিষ্ট সাম্প্রদায়িক ঐতিহ্য জড়িত নয়, কারণ নবগ্রহ পূজা সর্ব-হিন্দু জ্যোতিষচর্চার একটি মৌলিক দিক।