॥ दोहा ॥
पहले साईं के चरण में, अपना शीश नवाय।
कैसे शिरडी साईं बाबा, मेरे कष्ट मिटाय॥
॥ चौपाई ॥
साईं नाम का सुमिरन कर, साईं चालीसा गाय।
साईं कृपा से सब दुख दूर हो, मनवांछित फल पाय॥
शिरडी के साईं बाबा, तुम हो दीनदयाल।
भक्तों के दुख हरते हो, करते हो प्रतिपाल॥
बालक रूप में तुम आए, शिरडी ग्राम में।
लीलाएं तुमने दिखाई, अद्भुत धाम में॥
द्वारकामाई में तुम रहते, धूनी जलाई।
भक्तों को उदी देते, करते हो भलाई॥
सबका मालिक एक है, यही तुम्हारा ज्ञान।
हिन्दू मुस्लिम सब एक हैं, देते हो यह दान॥
कफनी पहने सिर पर कफन, बैठे हो तुम शांत।
भक्तों को देते हो दर्शन, करते हो भव-भ्रांत॥
पत्थर पर तुम बैठे रहते, देते हो उपदेश।
श्रद्धा सबुरी का पाठ पढ़ाते, मिटाते हो क्लेश॥
तुम्हारी महिमा अपरम्पार, गाते हैं सब भक्त।
जो भी शरण में आता है, होता है अनुरक्त॥
तुमने जलाया दीपक जल से, अद्भुत थी वह बात।
सब जन देख हुए विस्मित, साईं की करामात॥
भक्तों के तुमने कष्ट हरे, दिए अनेक वरदान।
तुम्हारी कृपा से ही तो, होता है कल्याण॥
कोढ़ियों को तुमने ठीक किया, अंधों को दी आँख।
बांझों को संतान दी, साईं की है यह साख॥
तुम्हारी लीला है न्यारी, कोई न जाने भेद।
तुम हो अंतर्यामी साईं, करते हो सब खेद॥
जो भी तुमको याद करे, तुम आते हो पास।
भक्तों की सुनते हो पुकार, पूरी करते हो आस॥
तुमने दिया सबको सहारा, जो भी था बेसहारा।
तुम्हारी शरण में आकर, मिलता है किनारा॥
तुमने सिखाया प्रेम भाव, और सिखाया त्याग।
तुम्हारी शिक्षा से ही तो, मिलता है वैराग्य॥
तुमने दिया सबको भोजन, जो भी था भूखा।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलता है सुख का मुखा॥
तुमने किया सबका भला, बिना किसी भेदभाव।
तुम्हारी दया से ही तो, मिटता है सब अभाव॥
तुमने दिया सबको ज्ञान, जो भी था अज्ञानी।
तुम्हारी शिक्षा से ही तो, बनती है कहानी॥
तुम हो मेरे साईं बाबा, तुम हो मेरे नाथ।
तुम्हारी कृपा से ही तो, चलता है मेरा साथ॥
तुम्हारी भक्ति में लीन होकर, मैं पावन हो जाऊं।
तुम्हारी शरण में आकर, मैं मुक्ति को पाऊं॥
तुम हो मेरे गुरुदेव, तुम हो मेरे इष्ट।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिटता है सब कष्ट॥
तुम हो मेरे जीवन का आधार, तुम हो मेरे प्राण।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलता है सम्मान॥
तुम हो मेरे माता-पिता, तुम हो मेरे बंधु।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिटता है सब अंधु॥
तुम हो मेरे सखा-सहेली, तुम हो मेरे मीत।
तुम्हारी कृपा से ही तो, गाता हूँ मैं गीत॥
तुम हो मेरे सर्वस्व, तुम हो मेरे भगवान।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलता है यह ज्ञान॥
तुम हो मेरे रक्षक, तुम हो मेरे त्राता।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिटती है सब घाता॥
तुम हो मेरे भाग्य विधाता, तुम हो मेरे कर्म।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलता है यह धर्म॥
तुम हो मेरे आराध्य देव, तुम हो मेरे पूज्य।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलता है यह सौख्य॥
तुम हो मेरे मार्गदर्शक, तुम हो मेरे पथ।
तुम्हारी कृपा से ही तो, चलता है यह रथ॥
तुम हो मेरे जीवन का लक्ष्य, तुम हो मेरी मंजिल।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलती है यह दिल॥
तुम हो मेरे मन की शांति, तुम हो मेरे धैर्य।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलता है यह धैर्य॥
तुम हो मेरे विश्वास, तुम हो मेरे श्रद्धा।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलती है यह श्रद्धा॥
तुम हो मेरे प्रेम, तुम हो मेरे भक्ति।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलती है यह शक्ति॥
तुम हो मेरे सत्य, तुम हो मेरे न्याय।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलता है यह न्याय॥
तुम हो मेरे धर्म, तुम हो मेरे कर्म।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलता है यह मर्म॥
तुम हो मेरे आशा, तुम हो मेरे विश्वास।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलती है यह आस॥
तुम हो मेरे जीवन का सार, तुम हो मेरे आधार।
तुम्हारी कृपा से ही तो, होता है यह पार॥
तुम हो मेरे साईं बाबा, तुम हो मेरे ईश्वर।
तुम्हारी कृपा से ही तो, मिलता है यह ईश्वर॥
॥ दोहा ॥
साईं चालीसा जो पढ़े, श्रद्धा से चित्त लाय।
मनोकामना पूर्ण हो, साईं कृपा फल पाय॥