Loading...
Loading...
ब्रह्मगुप्त ने 628 ई. में ऋण संख्याओं के नियम कैसे औपचारिक किए — यूरोप की स्वीकृति से 1000 वर्ष पहले — और देकार्त ने उन्हें "असत्य" क्यों कहा
628 ई. में ब्रह्मगुप्त ने जो किया वह क्रान्तिकारी था: उन्होंने एक ऐसी संख्या की कल्पना की जो "कुछ नहीं" से कम है। धन (सम्पत्ति) से ऋण (कर्ज) — यह गणितीय छलाँग थी जो यूरोप को 1000 वर्ष बाद भी डरा रही थी।
यà¥à¤à¤¨à¤®à¥: धन + धन = धन। à¤à¤£ + à¤à¤£ = à¤à¤£à¥¤ धन + à¤à¤£ = à¤à¤¨à¤à¥ ठनà¥à¤¤à¤° à¤à¥ दिशा।
वà¥à¤¯à¤µà¤à¤²à¤¨à¤®à¥: à¤à¤£ मà¥à¤ सॠà¤à¤£ à¤à¤à¤¾à¤¨à¤¾ = धन या à¤à¤£ (à¤à¥ बड़ा)। धन मà¥à¤ सॠà¤à¤£ à¤à¤à¤¾à¤¨à¤¾ = धन।
à¤à¥à¤£à¤¨à¤®à¥: धन à धन = धन। à¤à¤£ à à¤à¤£ = धन। धन à à¤à¤£ = à¤à¤£à¥¤
शà¥à¤¨à¥à¤¯ à¤à¥ साथ: शà¥à¤¨à¥à¤¯ + à¤à¤£ = à¤à¤£à¥¤ शà¥à¤¨à¥à¤¯ â à¤à¤£ = धन। शà¥à¤¨à¥à¤¯ à à¤à¤£ = शà¥à¤¨à¥à¤¯à¥¤
भारतीय व्यापारी हजारों वर्षों से खाता-बहियों में धन (सम्पत्ति) और ऋण (कर्ज) अलग-अलग दर्ज करते थे। दो रंगों की स्याही — काली धन के लिए, लाल ऋण के लिए — का उपयोग होता था। "लाल में होना" (in the red) आज भी अंग्रेजी में घाटे का प्रतीक है।
ब्रह्मगुप्त ने इस व्यावहारिक लेखांकन को गणितीय भाषा दी। "मेरी शुद्ध सम्पत्ति क्या है यदि मेरे पास 5 स्वर्ण हैं लेकिन मैं 8 स्वर्ण का ऋणी हूँ?" → 5 + (−8) = −3। सरल, व्यावहारिक, क्रान्तिकारी।