॥ दोहा ॥
जय जय जय श्रीपति श्रीरामा, व्यापक धरमात्मा।
दुष्ट निकंदन, सुखकरन, नमो नमो परमात्मा॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय जग पावन, प्रभु जय जय जय अविनाशी।
सर्वव्यापी, सर्वेश्वर, तुम हो घट घट वासी॥1॥
तुम हो निराकार, निर्गुण, तुम हो अविनाशी।
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, तुम ही, तुम ही हो अविनाशी॥2॥
तुम ही हो श्रीपति, लक्ष्मीपति, तुम ही हो जग के स्वामी।
तुम ही हो नारायण, वासुदेव, तुम ही हो अन्तर्यामी॥3॥
तुम ही हो शेषशायी, क्षीरसागर में वास।
लक्ष्मी संग विराजे, करते जग का त्रास॥4॥
तुम ही हो चक्रधारी, शंख, गदा, पद्म धारी।
गरुड़ वाहन, तुम ही हो, त्रैलोक्य के हितकारी॥5॥
तुम ही हो मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह अवतार।
वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि अवतार॥6॥
तुम ही हो धर्म रक्षक, तुम ही हो भक्त पालक।
तुम ही हो दुःख भंजन, तुम ही हो सुखदायक॥7॥
तुम ही हो भवसागर तारक, तुम ही हो मोक्ष दाता।
तुम ही हो आदि देव, तुम ही हो जग के त्राता॥8॥
तुम ही हो सृष्टि कर्ता, तुम ही हो पालनहारा।
तुम ही हो संहार कर्ता, तुम ही हो जग उजियारा॥9॥
तुम ही हो ज्ञान दाता, तुम ही हो विद्या दाता।
तुम ही हो बुद्धि दाता, तुम ही हो शक्ति दाता॥10॥
तुम ही हो यश दाता, तुम ही हो कीर्ति दाता।
तुम ही हो धन दाता, तुम ही हो पुत्र दाता॥11॥
तुम ही हो रोग हर्ता, तुम ही हो शोक हर्ता।
तुम ही हो भय हर्ता, तुम ही हो पाप हर्ता॥12॥
तुम ही हो ग्रह पीड़ा हर्ता, तुम ही हो शत्रु हर्ता।
तुम ही हो संकट हर्ता, तुम ही हो विघ्न हर्ता॥13॥
तुम ही हो सत्य स्वरूप, तुम ही हो चित्त स्वरूप।
तुम ही हो आनंद स्वरूप, तुम ही हो ब्रह्म स्वरूप॥14॥
तुम ही हो ओंकार स्वरूप, तुम ही हो वेद स्वरूप।
तुम ही हो यज्ञ स्वरूप, तुम ही हो तप स्वरूप॥15॥
तुम ही हो गंगा स्वरूप, तुम ही हो यमुना स्वरूप।
तुम ही हो गोदावरी स्वरूप, तुम ही हो नर्मदा स्वरूप॥16॥
तुम ही हो काशी स्वरूप, तुम ही हो मथुरा स्वरूप।
तुम ही हो अयोध्या स्वरूप, तुम ही हो द्वारका स्वरूप॥17॥
तुम ही हो बद्री स्वरूप, तुम ही हो केदार स्वरूप।
तुम ही हो रामेश्वर स्वरूप, तुम ही हो जगन्नाथ स्वरूप॥18॥
तुम ही हो सूर्य स्वरूप, तुम ही हो चंद्र स्वरूप।
तुम ही हो तारे स्वरूप, तुम ही हो ग्रह स्वरूप॥19॥
तुम ही हो वायु स्वरूप, तुम ही हो अग्नि स्वरूप।
तुम ही हो जल स्वरूप, तुम ही हो पृथ्वी स्वरूप॥20॥
तुम ही हो आकाश स्वरूप, तुम ही हो दिशा स्वरूप।
तुम ही हो काल स्वरूप, तुम ही हो कर्म स्वरूप॥21॥
तुम ही हो माता स्वरूप, तुम ही हो पिता स्वरूप।
तुम ही हो बंधु स्वरूप, तुम ही हो सखा स्वरूप॥22॥
तुम ही हो गुरु स्वरूप, तुम ही हो शिष्य स्वरूप।
तुम ही हो देव स्वरूप, तुम ही हो दानव स्वरूप॥23॥
तुम ही हो नर स्वरूप, तुम ही हो नारी स्वरूप।
तुम ही हो पशु स्वरूप, तुम ही हो पक्षी स्वरूप॥24॥
तुम ही हो वृक्ष स्वरूप, तुम ही हो लता स्वरूप।
तुम ही हो पुष्प स्वरूप, तुम ही हो फल स्वरूप॥25॥
तुम ही हो अन्न स्वरूप, तुम ही हो जल स्वरूप।
तुम ही हो वायु स्वरूप, तुम ही हो अग्नि स्वरूप॥26॥
तुम ही हो जीवन स्वरूप, तुम ही हो मरण स्वरूप।
तुम ही हो जन्म स्वरूप, तुम ही हो कर्म स्वरूप॥27॥
तुम ही हो सुख स्वरूप, तुम ही हो दुःख स्वरूप।
तुम ही हो लाभ स्वरूप, तुम ही हो हानि स्वरूप॥28॥
तुम ही हो जय स्वरूप, तुम ही हो पराजय स्वरूप।
तुम ही हो मान स्वरूप, तुम ही हो अपमान स्वरूप॥29॥
तुम ही हो शांति स्वरूप, तुम ही हो क्रांति स्वरूप।
तुम ही हो उदय स्वरूप, तुम ही हो अस्त स्वरूप॥30॥
तुम ही हो आदि स्वरूप, तुम ही हो अंत स्वरूप।
तुम ही हो मध्य स्वरूप, तुम ही हो अनंत स्वरूप॥31॥
तुम ही हो सत्य स्वरूप, तुम ही हो असत्य स्वरूप।
तुम ही हो धर्म स्वरूप, तुम ही हो अधर्म स्वरूप॥32॥
तुम ही हो पुण्य स्वरूप, तुम ही हो पाप स्वरूप।
तुम ही हो शुभ स्वरूप, तुम ही हो अशुभ स्वरूप॥33॥
तुम ही हो ज्ञान स्वरूप, तुम ही हो अज्ञान स्वरूप।
तुम ही हो विद्या स्वरूप, तुम ही हो अविद्या स्वरूप॥34॥
तुम ही हो मुक्ति स्वरूप, तुम ही हो बंधन स्वरूप।
तुम ही हो स्वर्ग स्वरूप, तुम ही हो नरक स्वरूप॥35॥
तुम ही हो देव स्वरूप, तुम ही हो मानव स्वरूप।
तुम ही हो भूत स्वरूप, तुम ही हो भविष्य स्वरूप॥36॥
तुम ही हो वर्तमान स्वरूप, तुम ही हो त्रिकाल स्वरूप।
तुम ही हो त्रिलोक स्वरूप, तुम ही हो त्रिभुवन स्वरूप॥37॥
तुम ही हो सर्व स्वरूप, तुम ही हो सर्व व्यापक।
तुम ही हो सर्वेश्वर, तुम ही हो सर्व पालक॥38॥
जो यह चालीसा पढ़े, सुने चित्त लगाय।
विष्णु कृपा से सुख मिले, पाप कटे मिट जाय॥39॥
जो यह चालीसा पढ़े, श्रद्धा भक्ति सहित।
मनोकामना पूर्ण हो, श्रीहरि करें हित॥40॥
॥ दोहा ॥
विष्णु चालीसा जो पढ़े, श्रद्धा से नर नार।
सुख सम्पति सब कुछ मिले, भवसागर से पार॥