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पितृदोषः
निर्माण नियम
सूर्य राहु/केतु से युत या दृष्ट, या सूर्य 9वें भाव में पीड़ित
उदाहरण कुण्डली
मेष लग्न उदाहरण — वास्तविक स्थिति भिन्न हो सकती है
पितृ दोष पूर्वजों और पूर्वजन्मों से कार्मिक ऋण दर्शाता है। यह मुख्यतः तब बनता है जब सूर्य (पिता/पूर्वज) राहु या केतु से पीड़ित हो, या 9वां भाव (पिता और भाग्य का भाव) पाप प्रभाव में हो।
यह दोष प्रतिभा और प्रयास के बावजूद अस्पष्ट बाधाएँ, बड़ों से आशीर्वाद प्राप्त करने में कठिनाई, और वंश में दुर्भाग्य के आवर्ती पैटर्न के रूप में प्रकट होता है।
पैतृक कर्म
अस्पष्ट बाधाएँ, पीढ़ियों में दुर्भाग्य के पैटर्न।
पिता सम्बन्ध
पिता से तनावपूर्ण सम्बन्ध, शीघ्र वियोग, पिता का स्वास्थ्य।
भाग्य
योग्य होने के बावजूद भाग्य में विलंब, देर से पर अंततः आता है।
मन्त्र
ॐ पितृभ्यो नमः
दान
अमावस्या पर श्राद्ध करें। ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। पिता की पुण्यतिथि पर अन्नदान।
शास्त्रीय सन्दर्भ
पितृदोषो यदा जन्मनि ग्रहैः प्रबलो भवेत्। तर्पणेन च दानेन शमं याति न संशयः॥
– Garuda Purana, Preta Khanda