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24 पवित्र कैलेंडर — त्योहार, गोचर, ग्रहण एवं शुभ तिथियाँ
भारतीय उपमहाद्वीप में तीन प्रमुख कैलेंडर परम्पराएँ साथ-साथ चलती हैं। (1) चान्द्र-सौर वैदिक पंचांग — चन्द्रमा का तिथि-चक्र सूर्य की सायन/निरयण गति से समायोजित, जो दीपावली, होली, एकादशी एवं अधिकांश व्रतों का आधार है। (2) सौर कैलेंडर — सूर्य के राशि-प्रवेश पर आधारित, तमिल पञ्चांगम (चित्थिराई से पंगुनि), मलयालम पञ्चांगम (कोल्लवर्षम/चिंगम), और बंगाली पञ्जिका (बैशाख से चैत्र) इसी श्रेणी में आते हैं। (3) ग्रेगोरियन सिविल कैलेंडर — सरकारी एवं अन्तरराष्ट्रीय व्यवहार के लिए। तीनों एक-दूसरे को प्रतिस्थापित नहीं करते — वे एक ही दिन के तीन भिन्न मानचित्र हैं।
चान्द्र मास की दो भिन्न परिपाटियाँ भी हैं। उत्तर भारतीय परम्परा "पूर्णिमान्त" है — मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है। दक्षिण भारतीय परम्परा "अमान्त" है — मास अमावस्या पर समाप्त होता है। दोनों एक ही चन्द्र-चक्र पर आधारित हैं, परन्तु एक मास के नामकरण में लगभग पन्द्रह दिनों का अन्तर होता है। हमारी मास तालिका एवं तिथि तालिका दोनों परिपाटियाँ साथ-साथ दिखाती हैं, जिससे आप अधिक मास के विशेष मासों — जैसे 2026 का ज्येष्ठ अधिक मास — एक नज़र में देख सकते हैं।
वर्ष-गणना भी एक नहीं है। उत्तर भारतीय परम्परा "विक्रम संवत्" का प्रयोग करती है (वर्तमान वर्ष 2083), जो लगभग ग्रेगोरियन से 57 वर्ष आगे चलता है। राष्ट्रीय सिविल कैलेंडर "शक संवत्" है (वर्तमान 1948), ग्रेगोरियन से 78 वर्ष पीछे। बंगाली परम्परा का "बंगाब्द" (वर्तमान 1433) है। तमिल परम्परा 60-वर्ष "संवत्सर चक्र" का अनुसरण करती है — पिंगल, काल युक्ति, सिद्धार्थी आदि। हिन्दू कैलेंडर 2026 पर इन सभी वर्ष-प्रणालियों का एक-स्थान सन्दर्भ देखें।
क्षेत्रीय परम्पराएँ कैलेंडर के साथ बारीकी से बंधी हुई हैं — उदाहरण: तमिल पञ्चांगम (चित्थिराई थिरुविळा से कार्तिगै दीपम तक), बंगाली पञ्जिका (पोइला बैशाख, दुर्गा पूजा, काली पूजा), गुजराती पंचांग (बेस्तु वरस, उत्तरायण), एवं इस्कॉन वैष्णव कैलेंडर। पूर्ण व्यवस्था सीखने के लिए हिन्दू कैलेंडर मॉड्यूल पढ़ें या मास पाठ्यक्रम का अध्ययन करें।