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अनन्त चतुर्दशी पूजा भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशीक दिन मध्याह्न (दोपहर) मे कएल जाइत अछि। गणेश विसर्जन दिनक कोनो समय कएल जा सकैत अछि मुदा परम्परागत रूप सँ साँझ मे कएल जाइत अछि।
अहाँक स्थान खोजि रहल अछि...
भोरमे उठि स्नान करू। पूजा स्थानकेँ स्वच्छ करू। अनन्त सूत्र तैयार करू: एकटा सूती धागा लिय, ओकरा हल्दी वा केशर सँ रङ्गि दिय, आ भगवान विष्णुकेँ नाम जप करैत १४ टा गाँठि बान्हू। वेदी पर भगवान विष्णुकेँ चित्र वा मूर्ति स्थापित करू।
अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा सुनू वा पाठ करू, जाहिमे भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिरकेँ ई व्रत करबाक लेल उपदेश दैत छथि, आ राजा सुमन्त तथा रानी सुशीलाकेँ कथा अछि जे ई व्रतसँ अपन हरायल समृद्धि पुनः प्राप्त केलनि।
१४ गाँठि वला अनन्त सूत्रकेँ पूजा करू चन्दन, कुमकुम आ अक्षत लगाकय। फूल आ धूप अर्पित करू। ई १४ टा गाँठि १४ लोककेँ (संसारकेँ) प्रतिनिधित्व करैत अछि जे भगवान विष्णु अपन अनन्त रूपमे धारण करैत छथि।
पवित्र अनन्त सूत्रकेँ दाहिना हाथक कलाईमे (पुरुष) वा बामा हाथक कलाईमे (महिला) बान्हू अनन्त मन्त्र जप करैत। ई धागा १४ दिन धरि पहिरल जाइत अछि आ फेर जलमे विसर्जित कयल जाइत अछि। ई भक्तक अनन्त भगवानक संगक सम्बन्धकेँ प्रतीक अछि।
भगवान गणेशक अन्तिम आरती करू। मोदक आ मिठाई अर्पित करू। मूर्ति पर कुमकुम तिलक लगाऊ। गणेशकें अगिला साल फेर आबय लेल प्रार्थना करू। "Ganapati Bappa Morya, Pudchya Varshi Lavkar Ya" (हे भगवान गणेश, अगिला साल फेर जल्दी आउ) मन्त्र जप करू।
गणेश प्रतिमाकेँ संगीत, जप आ नृत्यक संग शोभायात्रामे कोनो जल निकाय (नदी, पोखरि, समुद्र, वा तैयार कएल गेल कुण्ड) धरि लऽ जाऊ। प्रतिमाकेँ भक्तिपूर्वक धीरे-धीरे विसर्जित करू। पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाक उपयोग करू आ जल प्रदूषणकेँ कम करू। विसर्जनक बाद, घर घुमि आउ आ पाछाँ ताकि कऽ नहि देखू।