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देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल एकादशी कें पड़ैत अछि। व्रत दशमीक साँझ (पिछला राति) सँ प्रारम्भ होइत अछि आ पूजा एकादशीक दिन मध्याह्न (दोपहर) मुहूर्त मे कएल जाइत अछि। चातुर्मास (चारि पवित्र मास) एहि दिनसँ प्रारम्भ होइत अछि।
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पिछला साँझ (दशमी) सँ निर्जला (जलहीन) वा फलाहार (मात्र फल) व्रत प्रारम्भ करू। एकादशीक दिन सूर्योदयसँ पहिने उठू, स्नान करू आ पूर्ण भक्तिसँ व्रत रखबाक सङ्कल्प करू।
विष्णु केर प्रतिमा कें एकटा स्वच्छ वेदी पर स्थापित करू। प्रतिमा कें पञ्चामृतसँ स्नान कराऊ। पीयर वस्त्र पहिराऊ। चन्दनक तिलक लगाऊ। तुलसी पत्र, पीयर फूल, अक्षत आ कुङ्कुम अर्पित करू। घीक दीप आ धूप जराऊ।
सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत् सर्वं चराचरम्॥
supte tvayi jagannātha jagat suptaṃ bhavedidaṃ | vibuddhe tvayi budhyeta jagat sarvaṃ carācaram ||
हे जगत्पति, जखन अहाँ सुतय छी, तखन सम्पूर्ण संसार सुतय अछि। जखन अहाँ जागय छी, तखन समस्त प्राणी – चर आ अचर – जागी जाइत छथि।
चातुर्मासक व्रत करू – आगामी चारि मास धरि उच्च आध्यात्मिक अनुशासनक पालन करबाक सङ्कल्प करू। परम्परानुसार, एहि मे शामिल अछि अतिरिक्त उपवास, दान, मन्त्र जप आ किछु खास भोजनसँ परहेज (प्याज, लहसुन, बैंगन परम्परा पर निर्भर करैत अछि)।
विष्णु सहस्रनाम (विष्णु केर १००० नाम) अथवा कम सँ कम विष्णु स्तोत्रम् केर पाठ करू। ई देवशयनी एकादशी केर मुख्य आध्यात्मिक अभ्यास अछि।
भगवान् विष्णु केर लेल फूल आ तुलसी दल केर शय्या तैयार करू। प्रतीकात्मक रूप सँ, पुष्प शय्या पर प्रतिमा केँ शयन मुद्रा मे राखि कऽ देवता केँ सुताउ। ई विष्णु केर चारि मास धरि योग निद्रा मे प्रवेश करबाक प्रतिनिधित्व करैत अछि।
घी केर दीप आ कपूर सँ अन्तिम आरती करू। फल आ दूध सँ बनल मिठाई नैवेद्यक रूप मे अर्पित करू। प्रसाद वितरण करू। पारण (व्रत तोड़ब) द्वादशी केर भोर मे सूर्योदयक बाद कयल जाइत अछि।