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निशिता काल (मध्यरात्री) महाशिवरात्री पूजाक लेल सबसँ शुभ समय अछि। पारम्परिक अनुष्ठान मे राति भरि चारि प्रहरक पूजा शामिल अछि – प्रत्येक प्रहर सूर्यास्त सँ सूर्योदय धरि लगभग ३ घण्टाक होइत अछि।
अहाँक स्थान खोजि रहल अछि...
भोर सँ उपवास शुरू करू। स्नान करू, स्वच्छ वस्त्र धारण करू, आ शिवलिंगक लग शिवरात्री व्रतक लेल औपचारिक सङ्कल्प करू।
शुद्धिकरणक लेल आचमन (जलपान) करू, तत्पश्चात् मनकेँ शान्त करबाक लेल तीन बेर प्राणायाम (श्वास नियन्त्रण) करू।
भगवान शिव पर ध्यान करू – त्रिनेत्रधारी, चन्द्रशेखर, नीलकण्ठ, त्रिशूल, डमरू ओ वरद मुद्रा धारण कएने, नन्दीक संग कैलाश पर्वत पर विराजमान।
प्रथम प्रहरक पूजा (लगभग साँझ ६ बजे सँ राति ९ बजे धरि) करू। 'ॐ नमः शिवाय' मन्त्रक जप करैत शिवलिंगकेँ दूध सँ स्नान कराऊ। बेलपत्र ओ उज्जर फूल चढ़ाऊ। घीक दीप ओ धूप जड़ाऊ।
ॐ नमः शिवाय
oṃ namaḥ śivāya
भगवान शिवकें प्रणाम – पञ्चाक्षरी मन्त्र सभ वेदक सार अछि।
द्वितीय प्रहरक पूजा (लगभग राति ९ बजे सँ १२ बजे धरि) करू। शिवलिंगकेँ दही सँ स्नान कराऊ। बेलपत्र, धतूरक फूल ओ भस्म चढ़ाऊ। रुद्र गायत्री मन्त्रक पाठ करू।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वागीशाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्
oṃ tatpuruṣāya vidmahe vāgīśāya dhīmahi tanno rudraḥ pracodayāt
हम परम सत्ता पर ध्यान करैत छी, हम वाक्-पतिक चिन्तन करैत छी। ओ रुद्रा हमरा सभकेँ प्रेरित आ आलोकित करथि।
तृतीय प्रहरक पूजा (लगभग राति १२ बजे सँ भोर ३ बजे धरि) करू। शिवलिंगकेँ घी सँ स्नान कराऊ। बेलपत्र ओ धूप चढ़ाऊ। महामृत्युञ्जय मन्त्रक १०८ बेर जप करू।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
oṃ tryambakaṃ yajāmahe sugandhiṃ puṣṭivardhanam | urvārukamiva bandhanānmṛtyormukṣīya māmṛtāt ||
हम त्रिनेत्रधारी भगवान (शिव) क पूजा करैत छी जे सुगन्धित छथि आ सभ प्राणीकेँ पोषित करैत छथि। जेना काँकरि अपन लतासँ मुक्त होइत अछि, तेना हम मृत्युसँ मुक्त भ सकि, अमरतासँ नहि।
चतुर्थ प्रहर पूजा करू (लगभग भोर ३ बजे सँ ६ बजे धरि)। शिवलिंगक मधु सँ अभिषेक करू। बेलपत्र, भस्म आ रुद्राक्ष अर्पित करू। शिव ध्यान मन्त्रक पाठ करू।
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्। पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववन्द्यं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
dhyāyennityaṃ maheśaṃ rajatagirinibhaṃ cārucandāvataṃsaṃ ratnākalpojjvalāṅgaṃ paraśumṛgavarābhītihastṃ prasannam | padmāsīnaṃ samantāt stutamamaragaṇairvyāghrakṛttiṃ vasānaṃ viśvādyaṃ viśvavandyaṃ nikhilabhayaharaṃ pañcavaktraṃ trinetram ||
महेश्वरक सदैव ध्यान करबाक चाही – जे चाँदीक पहाड़ सन चमकैत छथि, सुन्दर चन्द्रमा सँ सुशोभित, जिनक अङ्ग रत्न-आभूषण सँ जगमगा रहल अछि, जे कुल्हाड़ी, मृग, वरदान देनिहार आ भय दूर करनिहार हाथ धारण केने छथि, जे शान्त छथि, कमल पर विराजमान छथि, देवतासभ द्वारा प्रशंसित, बाघक खाल पहिरने छथि, ब्रह्माण्डक उत्पत्ति आ स्वामी, सभ भय केँ दूर करनिहार, पञ्चमुखी आ त्रिनेत्रधारी छथि।
प्रहर पूजाक बीच, ॐ नमः शिवाय केर निरन्तर जप करैत रहू आ समय-समय पर शिव गायत्री मन्त्रक पाठ करू।
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्
oṃ tatpuruṣāya vidmahe mahādevāya dhīmahi tanno rudraḥ pracodayāt
हम परम सत्ता पर ध्यान करैत छी, हम महान ईश्वरक चिन्तन करैत छी। ओ रुद्रा हमरा सभकेँ प्रेरित आ आलोकित करथि।
प्रत्येक प्रहर मे शिवलिंगक समक्ष धूप अर्पित करू। प्राकृतिक धूप वा कपूरक प्रयोग करू।
शिवलिंगक समीप राति भरि घीक दीपक जरैत राखू। यदि बुझि जाए तँ फेर सँ जराउ।
नैवेद्यक रूप मे फल, बेलक शरबत, ठंडाई आ सूखा मेवा अर्पित करू। किछु लोक परम्परा अनुसार भाङ सेहो अर्पित करैत छथि।
यदि सम्भव अछि तँ यजुर्वेदसँ रुद्रम् (नमकम् आ चमकम्) कऽ पाठ करू। ई शिवक पूजाक सर्वोच्च रूप अछि।
प्रत्येक प्रहर पूजाक बाद कपूर आ घीक दीपसँ "ॐ जय शिव ॐकारा" गाबैत आरती करू।
शिवलिंगक प्रदक्षिणा करू – मुदा परम्परानुसार शिवक लेल, जलहरी/अर्घा (जल निकासीक मार्ग) कऽ पार नहि करू। आधा धरि जाउ आ दोसर दिससँ घूमि आउ।
चारिम प्रहरक पूजाक बाद, सूर्योदयक समय अन्तिम पूजा सम्पन्न करू। सूर्योदयक बाद सात्विक भोजनसँ – फल, दूध, वा सामान्य शाकाहारी भोजनसँ व्रत तोड़ू।