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वट सावित्री उत्तर भारतीय परम्परामे ज्येष्ठ अमावस्या (ज्येष्ठ मासक अमावस्या) वा किछु क्षेत्रमे ज्येष्ठ पूर्णिमाकेँ पड़ैत अछि। पूजा भोरक समयमे बरगदक गाछ लग कएल जाइत अछि। व्रत एक दिन पहिने साँझमे आरम्भ होइत अछि।
अहाँक स्थान खोजि रहल अछि...
वट सावित्रीसँ एक दिन पहिने साँझमे, सूर्यास्तसँ पहिने हल्का सात्विक भोजन करू। व्रत करबाक सङ्कल्प करू। सभ पूजा सामग्री आ पवित्र धागा (कलावा) तैयार करू।
सूर्योदयसँ पहिने उठू। पवित्र स्नान करू। लाल वा पीयर साड़ी पहिरू आ पूर्ण सौभाग्यक सामग्री (सिन्दूर, चूड़ी, मङ्गळसूत्र, बिन्दी) धारण करू।
बरगद गाछ (वट वृक्ष) लग जाऊ। गाछक चारू दिसक स्थानकेँ साफ करू। जड़िक लग कलश राखू। जल आ अक्षत लऽ कऽ विधिपूर्वक सङ्कल्प करू।
बरगद गाछक ठूठ पर हल्दी आ कुमकुम लगाऊ। जड़ि पर फूल, अक्षत आ जल चढ़ाऊ। गाछक लग धूप आ दीप जराऊ। बरगद गाछकेँ स्वयं ब्रह्मा, विष्णु आ शिवक स्वरूप मानि कऽ पूजा कएल जाइत अछि।
बरगद गाछक सोझाँ बैसि कऽ सावित्री मन्त्रक १०८ बेर जप करू। सावित्री देवी सँ अपन पतिक दीर्घायुक लेल प्रार्थना करू, जेना सावित्री यम (मृत्युक देवता) सँ सत्यवानकेँ वापस पओने छलीह।
ॐ ह्रीं सावित्र्यै नमः
oṃ hrīṃ sāvitryai namaḥ
ॐ, देवी सावित्री केँ प्रणाम, जे पत्नीधर्मक प्रतिमूर्ति आ मृत्यु पर विजय प्राप्त करयवाली छथि।
बरगद गाछक सात बेर परिक्रमा करू, प्रत्येक फेरा मे गाछक ठूठ पर पवित्र धागा (कलावा) लपेटू। लपेटैत काल वट वृक्ष मन्त्रक जप करू। ई धागा अपन पतिक जीवनकेँ अनन्त बरगद गाछ सँ बान्हबाक प्रतीक अछि।
वट वृक्षं महापुण्यं सदा हरितपल्लवम्। इष्टदं सर्वभूतानां वटवृक्षं नमाम्यहम्॥
vaṭa vṛkṣaṃ mahāpuṇyaṃ sadā haritapallavām | iṣṭadaṃ sarvabhūtānāṃ vaṭavṛkṣaṃ namāmyaham ||
हम वट वृक्ष केँ प्रणाम करैत छी, जे परम पुण्यदायी, सदिखन हरियर पातवला, सभ प्राणीक लेल मनोकामना पूर्ण करयवला छथि।
महाभारत (वन पर्व) सँ सावित्री आ सत्यवानक कथा पढ़ू वा सुनू। ई कथा बताबैत अछि जेना समर्पित पत्नी सावित्री यमक पाछू मृत्युलोक धरि गेलीह आ अपन ज्ञान आ भक्ति सँ अपन पतिक जीवनकेँ वापस पओलीह।
पूजा आ कथा सम्पन्न भेलाक बाद, दोसर दिन भोरमे सूर्योदयक बाद व्रत तोड़ू। पहिने जल, फेर फल, तकर बाद हल्का भोजन ग्रहण करू। पतिक आ बड़ लोकनिक आशीर्वाद प्राप्त करू।