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आर्यभट ने 499 ई. में π को 4 दशमलव तक कैसे गणना की, और केरल के माधव ने 900 वर्ष बाद 11 दशमलव तक कैसे पहुँचे
499 ई. में, जब यूरोपीय गणित अभी भी आर्किमिडीज़ की जीवा-विधि से जूझ रहा था, आर्यभट ने एक श्लोक में न केवल π = 3.1416 दिया, बल्कि एक ऐसा शब्द ("आसन्नः") भी जोड़ा जो गणित के इतिहास में 1200 से अधिक वर्षों तक अद्वितीय रहा।
“चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिश्च तथा सहस्राणाम्। अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥”
अनुवाद: "100 में 4 जोड़ो, 8 से गुणा करो, और 62000 में जोड़ो। यह 20000 व्यास वाले वृत्त की परिधि का आसन्न (सन्निकट) मान है।"
गणना: (100 + 4) × 8 + 62000 = 832 + 62000 = 62832। π = 62832 ÷ 20000 = 3.1416।
आसन्नः का महत्त्व: "आसन्न" = "निकटतम" = "सटीक नहीं।" यह शब्द संकेत देता है कि आर्यभट को पता था यह मान अनुमानित है, और संभवतः उन्होंने महसूस किया था कि π को कोई सरल भिन्न व्यक्त नहीं कर सकती।
आर्किमिडीज (~250 BCE): 223/71 ते 22/7 पर्यंत — ~2 अचूक दशांश
आर्यभट (499 CE): 3.1416 — 4 अचूक दशांश
चीन (~480 CE): झू चोंगझी — 355/113 ≈ 3.14159 — 6 दशांश
माधव (~1375 CE): 3.14159265359 — 11 दशांश
युरोप (~1600 CE): व्हॅन स्यूलन — 20+ दशांश (परंतु अनंत श्रेणी अजून नव्हती)