सफला एकादशी
व्रतसभी प्रयासों में सफलता (सफला) प्रदान करती है।
margashirsha कृष्ण
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2027 का सम्पूर्ण हिन्दू पंचांग – सभी प्रमुख त्योहार, एकादशी व्रत तिथियाँ, ग्रहण, पूर्णिमा और अमावस्या। उज्जैन (हिन्दू खगोल विज्ञान की पारम्परिक प्रधान याम्योत्तर) से शास्त्रीय वैदिक गणनाओं द्वारा गणित। सभी भारतीय नगरों के लिए सटीक।
हिन्दू कैलेंडर एक साथ खगोलीय और आध्यात्मिक है। प्रत्येक त्योहार की तिथि वास्तविक खगोलीय घटनाओं से गणित होती है — दीपावली कार्तिक की अमावस्या (नवचन्द्र) पर आती है, होली फाल्गुन की पूर्णिमा पर, गणेश चतुर्थी भाद्रपद की चतुर्थी पर। ये मनमानी तिथियाँ नहीं हैं — ये सटीक चन्द्र-सौर संरेखण हैं। यह कैलेंडर वैदिक समझ की एक जीवन्त अभिव्यक्ति है कि मानव जीवन ब्रह्माण्डीय लय से अन्तर्गुन्थित है।
सभी प्रयासों में सफलता (सफला) प्रदान करती है।
margashirsha कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
margashirsha कृष्ण
margashirsha कृष्ण
margashirsha कृष्ण
सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
margashirsha कृष्ण
pausha शुक्ल
गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
pausha शुक्ल
सूर्य मकर राशि में प्रवेश – उत्तरायण का आरम्भ। पवित्र स्नान, दान और तिल।
शुक्ल
सूर्य मकर राशि में प्रवेश – उत्तरायण का आरम्भ। पवित्र स्नान, दान और तिल।
शुक्ल
सूर्य मकर राशि में प्रवेश – उत्तरायण का आरम्भ। पवित्र स्नान, दान और तिल।
शुक्ल
सूर्य मकर राशि में प्रवेश – उत्तरायण का आरम्भ। पवित्र स्नान, दान और तिल।
शुक्ल
सूर्य मकर राशि में प्रवेश – उत्तरायण का आरम्भ। पवित्र स्नान, दान और तिल।
शुक्ल
सूर्य मकर राशि में प्रवेश – उत्तरायण का आरम्भ। पवित्र स्नान, दान और तिल।
शुक्ल
अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। भक्त साहस, नकारात्मकता से रक्षा और बाधाओं पर विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
pausha शुक्ल
pausha शुक्ल
सूर्य मकर राशि में प्रवेश – उत्तरायण का आरम्भ। पवित्र स्नान, दान और तिल।
शुक्ल
सूर्य मकर राशि में प्रवेश – उत्तरायण का आरम्भ। पवित्र स्नान, दान और तिल।
शुक्ल
दिव्य माँ के प्रति भक्ति का मासिक नवीनीकरण। दुर्गा शक्ति के रक्षात्मक, उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। नियमित अष्टमी पूजा भय दूर कर साहस प्रदान करती है।
pausha शुक्ल
pausha शुक्ल
सन्तान, विशेषतः सुयोग्य पुत्र प्रदान करती है।
pausha शुक्ल
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
pausha शुक्ल
pausha शुक्ल
विघ्नहर्ता की मासिक पूजा। कृष्ण चतुर्थी (ढलते चन्द्र का 4वाँ दिन) पर।
pausha कृष्ण
कृष्ण के प्रति मासिक भक्ति भक्त को उनके प्रेम, कर्तव्य और समर्पण के उपदेशों से जोड़े रखती है।
pausha कृष्ण
तिल दान दरिद्रता दूर करता है।
pausha कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
pausha कृष्ण
pausha कृष्ण
pausha कृष्ण
pausha कृष्ण
सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
pausha कृष्ण
तान्त्रिक साधना के लिए गुप्त नवरात्रि मुख्य नवरात्रि से भी अधिक शक्तिशाली मानी जाती है। मन्त्र सिद्धि और आध्यात्मिक जागृति के लिए विशेष प्रभावशाली।
magha शुक्ल
magha शुक्ल
magha शुक्ल
गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
magha शुक्ल
वसन्त ऋतु के आगमन का प्रतीक। शिक्षा, संगीत और कला आरम्भ करने का सबसे शुभ दिन।
magha शुक्ल
magha शुक्ल
अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। भक्त साहस, नकारात्मकता से रक्षा और बाधाओं पर विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
magha शुक्ल
रथ सप्तमी सूर्य के प्रतीकात्मक जन्मदिवस और वसन्त आगमन का सूचक है। आक के पत्तों से स्नान सात जन्मों के पापों का नाश करता है।
magha शुक्ल
सूर्य कुम्भ राशि में प्रवेश – कुम्भ संक्रान्ति।
शुक्ल
भीष्म अष्टमी त्याग, दृढ़ संकल्प और प्रतिज्ञापालन का सन्देश देती है। इस दिन तर्पण करना सभी पितरों के तर्पण के समान माना जाता है।
magha शुक्ल
दिव्य माँ के प्रति भक्ति का मासिक नवीनीकरण। दुर्गा शक्ति के रक्षात्मक, उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। नियमित अष्टमी पूजा भय दूर कर साहस प्रदान करती है।
magha शुक्ल
magha शुक्ल
शत्रुओं और बाधाओं पर विजय (जया) प्रदान करती है।
magha शुक्ल
हिन्दू शास्त्रों के सबसे महान चरित्रों में से एक का सम्मान – जिन्होंने पिता की इच्छा के लिए व्यक्तिगत सुख त्यागा और आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत निभाया।
magha शुक्ल
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
magha शुक्ल
magha शुक्ल
magha शुक्ल
magha शुक्ल
प्रत्येक पूर्णिमा का हिन्दू महीने के आधार पर विशेष नाम और महत्व है। पूर्णिमा प्रार्थना, ध्यान और दान के प्रभावों को बढ़ाती है।
magha शुक्ल
विघ्नहर्ता की मासिक पूजा। कृष्ण चतुर्थी (ढलते चन्द्र का 4वाँ दिन) पर।
magha कृष्ण
magha कृष्ण
कृष्ण के प्रति मासिक भक्ति भक्त को उनके प्रेम, कर्तव्य और समर्पण के उपदेशों से जोड़े रखती है।
magha कृष्ण
सभी युद्धों और कार्यों में विजय की गारण्टी। स्वयं राम ने यह व्रत रखा था।
magha कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
magha कृष्ण
वर्ष की सबसे अन्धकारमय रात्रि – अन्धकार और अज्ञान पर विजय का प्रतीक। इस रात्रि शिव की ऊर्जा सर्वाधिक सुलभ मानी जाती है।
magha कृष्ण
magha कृष्ण
magha कृष्ण
सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
magha कृष्ण
phalguna शुक्ल
phalguna शुक्ल
गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
phalguna शुक्ल
phalguna शुक्ल
अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। भक्त साहस, नकारात्मकता से रक्षा और बाधाओं पर विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
phalguna शुक्ल
सूर्य मीन राशि में प्रवेश – मीन संक्रान्ति।
शुक्ल
दिव्य माँ के प्रति भक्ति का मासिक नवीनीकरण। दुर्गा शक्ति के रक्षात्मक, उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। नियमित अष्टमी पूजा भय दूर कर साहस प्रदान करती है।
phalguna शुक्ल
इस दिन आँवले के वृक्ष की पूजा सहस्र गायों के दान के बराबर है।
phalguna शुक्ल
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
phalguna शुक्ल
होलिका दहन भक्ति की आसुरी शक्ति पर और सत्य की असत्य पर विजय का प्रतीक है। पवित्र अग्नि वातावरण को शुद्ध करती है और नकारात्मकता को जलाती है। यह होली की पूर्व संध्या पर मनाया जाता है – अगली सुबह रंगों का त्योहार आरम्भ होता है।
phalguna शुक्ल
अच्छाई (प्रह्लाद की भक्ति) की बुराई (हिरण्यकशिपु के अहंकार) पर विजय। वसन्त, नवीनता और सामाजिक एकता का उत्सव।
phalguna शुक्ल
phalguna शुक्ल
phalguna शुक्ल
विघ्नहर्ता की मासिक पूजा। कृष्ण चतुर्थी (ढलते चन्द्र का 4वाँ दिन) पर।
phalguna कृष्ण
phalguna कृष्ण
कृष्ण के प्रति मासिक भक्ति भक्त को उनके प्रेम, कर्तव्य और समर्पण के उपदेशों से जोड़े रखती है।
phalguna कृष्ण
सभी पापों का नाश, टूटे व्रतों और शापों के प्रभाव को हटाती है
phalguna कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
phalguna कृष्ण
phalguna कृष्ण
phalguna कृष्ण
phalguna कृष्ण
सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
phalguna कृष्ण
चैत्र नवरात्रि हिन्दू नववर्ष और वसन्त आगमन का प्रतीक है। नई शुरुआत, साधना और देवी कृपा के लिए सबसे शुभ समय माना जाता है।
chaitra शुक्ल
उगादि गृह की उस वर्ष को एक पूर्ण घटना के रूप में औपचारिक स्वीकृति है, न कि केवल उसके मधुर अंशों की। पच्चड़ी के छह रस — तिक्त, कषाय, अम्ल, लवण, कटु, मधुर — नववर्ष की प्रातः जानकर एक साथ, एक ही ग्रास में खाये जाते हैं: परिवार आगामी मासों के लिए कोई कामना बनने से पूर्व, देह में ही स्वीकार करता है कि वर्ष में छहों होंगे और वर्ष के भीतर रह कर उनमें से किसी से बाहर रहने का कोई मार्ग नहीं है। पञ्चाङ्ग श्रवणम् वही शिक्षा भिन्न रजिस्टर में वहन करता है: वर्ष की गतियाँ आरम्भ में सार्वजनिक की जाती हैं, गृह उन्हें सुनता है, और गृह वर्ष में आश्चर्यचकित होने के बजाय सूचित प्रवेश करता है। दोनों अनुष्ठान मिलकर उगादि की विशिष्ट तत्त्व-दृष्टि रचते हैं — नववर्ष कोई उपहार नहीं है जिसे खोला जाना है, अपितु एक पूर्ण धार्मिक संलग्नता है जिसमें आँखें खुली रख कर प्रवेश किया जाता है। पर्व यह कैलेण्डर-सङ्केत भी है कि ब्रह्माण्डीय घड़ी ने अपना अगला 360-दिवसीय चक्र आरम्भ किया है: ब्रह्म पुराण का सृष्टि-वृत्तान्त इसी प्रभात पर सृष्टि को रखता है, और गृह पच्चड़ी और पञ्चाङ्ग के अनुष्ठान दोहराकर अपनी रसोई और देहरी के स्तर पर समय के नवीकरण में सहभागी होता है।
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। भक्त साहस, नकारात्मकता से रक्षा और बाधाओं पर विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
सूर्य मेष राशि में प्रवेश – मेष संक्रान्ति / बैसाखी।
शुक्ल
सूर्य मेष राशि में प्रवेश – विशु।
शुक्ल
सूर्य मेष राशि में प्रवेश – पुतंडू।
शुक्ल
सूर्य मेष राशि में प्रवेश – पोइला बोइशाख।
शुक्ल
सूर्य मेष राशि में प्रवेश – बोहाग बिहू।
शुक्ल
सूर्य मेष राशि में प्रवेश – पना संक्रान्ति (ओड़िआ नव वर्ष)।
शुक्ल
सूर्य मेष राशि में प्रवेश – जुड़-शीतल (मिथिला नव वर्ष)।
शुक्ल
दिव्य माँ के प्रति भक्ति का मासिक नवीनीकरण। दुर्गा शक्ति के रक्षात्मक, उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। नियमित अष्टमी पूजा भय दूर कर साहस प्रदान करती है।
chaitra शुक्ल
मर्यादा पुरुषोत्तम के जन्म का उत्सव – जिन्होंने प्रत्येक कदम पर धर्म का पालन किया।
chaitra शुक्ल
सभी इच्छाएँ पूर्ण करती है, ब्रह्महत्या तुल्य पापों को नष्ट करती है
chaitra शुक्ल
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
भक्ति, शक्ति और निःस्वार्थ सेवा के मूर्तिमान रूप का उत्सव। हनुमान आदर्श भक्त हैं – शक्तिशाली किन्तु विनम्र।
chaitra शुक्ल
chaitra शुक्ल
chaitra कृष्ण
विघ्नहर्ता की मासिक पूजा। कृष्ण चतुर्थी (ढलते चन्द्र का 4वाँ दिन) पर।
chaitra कृष्ण
कृष्ण के प्रति मासिक भक्ति भक्त को उनके प्रेम, कर्तव्य और समर्पण के उपदेशों से जोड़े रखती है।
chaitra कृष्ण
यमराज का भय दूर करती है, रक्षा और पुण्य प्रदान करती है
chaitra कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
chaitra कृष्ण
chaitra कृष्ण
chaitra कृष्ण
सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
chaitra कृष्ण
अक्षय तृतीया हिन्दू कैलेंडर के सबसे शुभ दिनों में से एक है – प्रत्येक क्षण मुहूर्त है, अलग शुभ मुहूर्त की आवश्यकता नहीं। यह स्वयंसिद्ध मुहूर्त दिवस है।
vaishakha शुक्ल
विष्णु के चिरंजीवी योद्धा-ऋषि अवतार का सम्मान जिन्होंने न्याय की रक्षा की। माना जाता है कि वे महेन्द्रगिरि पर्वत पर आज भी विद्यमान हैं।
vaishakha शुक्ल
गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
vaishakha शुक्ल
vaishakha शुक्ल
vaishakha शुक्ल
अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। भक्त साहस, नकारात्मकता से रक्षा और बाधाओं पर विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
vaishakha शुक्ल
vaishakha शुक्ल
vaishakha शुक्ल
दिव्य माँ के प्रति भक्ति का मासिक नवीनीकरण। दुर्गा शक्ति के रक्षात्मक, उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। नियमित अष्टमी पूजा भय दूर कर साहस प्रदान करती है।
vaishakha शुक्ल
vaishakha शुक्ल
vaishakha शुक्ल
vaishakha शुक्ल
सूर्य वृषभ राशि में प्रवेश – वृषभ संक्रान्ति।
शुक्ल
vaishakha शुक्ल
मोह का नाश, स्पष्टता और आध्यात्मिक प्रगति
vaishakha शुक्ल
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
vaishakha शुक्ल
विष्णु के उग्र अवतार का उत्सव जो सिद्ध करता है कि भक्तों की रक्षा सर्वत्र होती है। अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक।
vaishakha शुक्ल
बुद्ध पूर्णिमा ज्ञान, करुणा और मध्यम मार्ग का परम प्रतीक है। यह स्मरण कराती है कि सम्यक् प्रयास से बोधि प्राप्त हो सकती है।
vaishakha शुक्ल
vaishakha शुक्ल
vaishakha शुक्ल
प्रत्येक पूर्णिमा का हिन्दू महीने के आधार पर विशेष नाम और महत्व है। पूर्णिमा प्रार्थना, ध्यान और दान के प्रभावों को बढ़ाती है।
vaishakha शुक्ल
विघ्नहर्ता की मासिक पूजा। कृष्ण चतुर्थी (ढलते चन्द्र का 4वाँ दिन) पर।
vaishakha कृष्ण
कृष्ण के प्रति मासिक भक्ति भक्त को उनके प्रेम, कर्तव्य और समर्पण के उपदेशों से जोड़े रखती है।
vaishakha कृष्ण
अपरिमित पुण्य, अपयश दूर करती है
vaishakha कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
vaishakha कृष्ण
vaishakha कृष्ण
vaishakha कृष्ण
सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
vaishakha कृष्ण
jyeshtha शुक्ल
गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
jyeshtha शुक्ल
jyeshtha शुक्ल
अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। भक्त साहस, नकारात्मकता से रक्षा और बाधाओं पर विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
jyeshtha शुक्ल
jyeshtha शुक्ल
दिव्य माँ के प्रति भक्ति का मासिक नवीनीकरण। दुर्गा शक्ति के रक्षात्मक, उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। नियमित अष्टमी पूजा भय दूर कर साहस प्रदान करती है।
jyeshtha शुक्ल
गंगा दशहरा दस प्रकार के पापों का नाश करती है। इस दिन गंगा स्नान सभी तीर्थों के स्नान के समान माना जाता है। गंगा की पवित्रता और मोक्षदायिनी शक्ति का उत्सव है।
jyeshtha शुक्ल
jyeshtha शुक्ल
निर्जला एकादशी भारतीय ग्रीष्म के चरम (ज्येष्ठ मास, मई-जून) में पड़ती है जब सूर्य सर्वाधिक तीव्र होता है – और पूर्ण निर्जल व्रत हिन्दू वर्ष की सर्वाधिक कठोर तपस्या है। पद्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, और महाभारत सभी इसे परम एकादशी कहते हैं: एक श्रद्धापूर्ण आचरण सभी 24 वार्षिक एकादशियों के समान पुण्य देता है। परम्परा यह मानती है कि जो भक्त सभी 24 एकादशियाँ नहीं रख सकते, वे इसी एक का व्रत करके वैकुण्ठ-प्राप्ति का अधिकारी बन सकते हैं – ठीक वही वरदान जो भीम ने माँगा था। व्यक्तिगत पुण्य के परे, यह दिन हिन्दू धर्म की सबसे सुन्दर ग्रीष्मकालीन परम्पराओं में से एक – जल-दान – को स्थापित करता है। भक्त कलश-स्थल लगाते हैं, ठंडा जल और गन्ने का रस बाँटते हैं, और सप्ताहों तक प्यासे जनों को भोजन कराते हैं – व्यक्तिगत तपस्या को सामूहिक करुणा में बदल देते हैं। इसी से निर्जला को प्रायः "एकादशियों का राजा" भी कहा जाता है – केवल पुण्य की मात्रा के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि यह हिन्दू व्रत के पूरे चक्र को अंगीकार करती है: स्वेच्छा-तप, दैवी अनुग्रह, वरदान-प्राप्ति, और समुदाय के साथ पुण्य-विभाजन।
jyeshtha शुक्ल
सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश – मिथुन संक्रान्ति।
शुक्ल
सूर्य मिथुन राशि में प्रवेश – रज पर्व (मिथुन संक्रान्ति)।
शुक्ल
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
jyeshtha शुक्ल
समर्पित पत्नी के प्रेम की शक्ति का उत्सव। बरगद का वृक्ष अमरत्व का प्रतीक है। सावित्री की कथा सिखाती है कि सच्ची भक्ति और बुद्धि मृत्यु को भी जीत सकती है।
jyeshtha शुक्ल
jyeshtha शुक्ल
jyeshtha शुक्ल
jyeshtha शुक्ल
jyeshtha कृष्ण
विघ्नहर्ता की मासिक पूजा। कृष्ण चतुर्थी (ढलते चन्द्र का 4वाँ दिन) पर।
jyeshtha कृष्ण
कृष्ण के प्रति मासिक भक्ति भक्त को उनके प्रेम, कर्तव्य और समर्पण के उपदेशों से जोड़े रखती है।
jyeshtha कृष्ण
रोगों से मुक्ति, शापों को हटाती है, तीर्थस्थलों पर दान से अधिक पुण्यदायी
jyeshtha कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
jyeshtha कृष्ण
jyeshtha कृष्ण
ashadha शुक्ल
jyeshtha कृष्ण
ashadha शुक्ल
सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
jyeshtha कृष्ण
भारत के सबसे भव्य उत्सवों में से एक, ईश्वर के समक्ष समानता का प्रतीक – जगन्नाथ गर्भगृह से बाहर आते हैं ताकि सभी को दर्शन मिले।
ashadha शुक्ल
गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
ashadha शुक्ल
अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। भक्त साहस, नकारात्मकता से रक्षा और बाधाओं पर विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
ashadha शुक्ल
दिव्य माँ के प्रति भक्ति का मासिक नवीनीकरण। दुर्गा शक्ति के रक्षात्मक, उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। नियमित अष्टमी पूजा भय दूर कर साहस प्रदान करती है।
ashadha शुक्ल
ashadha शुक्ल
ashadha शुक्ल
चातुर्मास का आरम्भ। आध्यात्मिक साधना और दान के लिए अत्यन्त शुभ।
ashadha शुक्ल
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
ashadha शुक्ल
ashadha शुक्ल
सूर्य कर्क राशि में प्रवेश – दक्षिणायन का आरम्भ।
शुक्ल
आषाढ़ की पूर्णिमा गुरु तत्व को समर्पित है – अन्धकार का निवारक (गु = अन्धकार, रु = निवारक)।
ashadha शुक्ल
ashadha शुक्ल
ashadha शुक्ल
प्रत्येक पूर्णिमा का हिन्दू महीने के आधार पर विशेष नाम और महत्व है। पूर्णिमा प्रार्थना, ध्यान और दान के प्रभावों को बढ़ाती है।
ashadha शुक्ल
ashadha कृष्ण
ashadha कृष्ण
विघ्नहर्ता की मासिक पूजा। कृष्ण चतुर्थी (ढलते चन्द्र का 4वाँ दिन) पर।
ashadha कृष्ण
ashadha कृष्ण
ashadha कृष्ण
कृष्ण के प्रति मासिक भक्ति भक्त को उनके प्रेम, कर्तव्य और समर्पण के उपदेशों से जोड़े रखती है।
ashadha कृष्ण
इस दिन तुलसी अर्पण करने से पुण्य अनन्तगुना बढ़ता है। मृत्यु का भय दूर होता है।
ashadha कृष्ण
ashadha कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
ashadha कृष्ण
ashadha कृष्ण
ashadha कृष्ण
ashadha कृष्ण
सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
ashadha कृष्ण
हरियाली तीज दाम्पत्य सुख, भक्ति और पति-पत्नी के बन्धन का उत्सव है। उत्तर भारत की विवाहित महिलाओं का सबसे महत्त्वपूर्ण त्योहार। हरा रंग उर्वरता और सावन की खुशी का प्रतीक है।
shravana शुक्ल
shravana शुक्ल
shravana शुक्ल
गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
shravana शुक्ल
नाग पञ्चमी नागों को पृथ्वी के रक्षक और पाताल के अधिपति के रूप में सम्मानित करती है। नाग कुण्डलिनी शक्ति और सन्तान का प्रतीक हैं। कालसर्प दोष निवारण में सहायक।
shravana शुक्ल
shravana शुक्ल
अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। भक्त साहस, नकारात्मकता से रक्षा और बाधाओं पर विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
shravana शुक्ल
दिव्य माँ के प्रति भक्ति का मासिक नवीनीकरण। दुर्गा शक्ति के रक्षात्मक, उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। नियमित अष्टमी पूजा भय दूर कर साहस प्रदान करती है।
shravana शुक्ल
shravana शुक्ल
वर्ष की दो पुत्रदा एकादशियों में दूसरी (पहली पौष शुक्ल)। दक्षिण भारतीय वैष्णव परम्पराओं में श्रावण व्रत पर अधिक जोर; उत्तर भारतीय स्मार्त परम्पराओं में पौष पर। अनेक दम्पति पूर्ण आवरण के लिए दोनों रखते हैं। शाब्दिक सन्तान से परे गहन शिक्षा: "आध्यात्मिक सन्तान" का पालन — शिष्य, छात्र, अगली पीढ़ी जिसका पालन-पोषण करते हैं — माँगे गये वर के समान वैध है।
shravana शुक्ल
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
shravana शुक्ल
दक्षिण भारत में विवाहित महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक। अष्ट लक्ष्मी के संयुक्त आशीर्वाद प्रदान करता है।
shravana शुक्ल
भाई-बहन के पवित्र बन्धन और रक्षा के कर्तव्य का उत्सव।
shravana शुक्ल
shravana शुक्ल
सूर्य सिंह राशि में प्रवेश – सिंह संक्रान्ति।
शुक्ल
विघ्नहर्ता की मासिक पूजा। कृष्ण चतुर्थी (ढलते चन्द्र का 4वाँ दिन) पर।
shravana कृष्ण
भगवद्गीता के वक्ता परमात्मा का जन्म। कृष्ण दिव्य प्रेम, ब्रह्माण्डीय ज्ञान और कर्मयोग के प्रतीक हैं।
shravana कृष्ण
shravana कृष्ण
कृष्ण के प्रति मासिक भक्ति भक्त को उनके प्रेम, कर्तव्य और समर्पण के उपदेशों से जोड़े रखती है।
shravana कृष्ण
संचित कष्टों का नाश, खोया सम्मान और भाग्य वापस
shravana कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
shravana कृष्ण
shravana कृष्ण
shravana कृष्ण
shravana कृष्ण
सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
shravana कृष्ण
हरतालिका तीज हिन्दू महिलाओं का सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है, विशेषकर उत्तर भारत, महाराष्ट्र और राजस्थान में। यह पार्वती की शिव के प्रति अटल भक्ति और स्त्री संकल्प की शक्ति का उत्सव है। दाम्पत्य सुख और पति की दीर्घायु के लिए अत्यन्त शक्तिशाली व्रत माना जाता है।
bhadrapada शुक्ल
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नई शुरुआत के देवता, विघ्नहर्ता। सभी कार्यों से पहले पूजित। ज्ञान, समृद्धि और भक्ति की शक्ति का उत्सव।
bhadrapada शुक्ल
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bhadrapada शुक्ल
गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
bhadrapada शुक्ल
bhadrapada शुक्ल
अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। भक्त साहस, नकारात्मकता से रक्षा और बाधाओं पर विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
bhadrapada शुक्ल
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bhadrapada शुक्ल
दिव्य माँ के प्रति भक्ति का मासिक नवीनीकरण। दुर्गा शक्ति के रक्षात्मक, उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। नियमित अष्टमी पूजा भय दूर कर साहस प्रदान करती है।
bhadrapada शुक्ल
चातुर्मास व्रतों का पुण्य प्राप्त होता है।
bhadrapada शुक्ल
राजा महाबलि की वार्षिक वापसी का उत्सव। केरल का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार, समृद्धि और समानता का प्रतीक।
bhadrapada शुक्ल
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त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
bhadrapada शुक्ल
अनन्त चतुर्दशी विष्णु की अनन्त और अविनाशी प्रकृति का प्रतीक है। 14 गाँठें 14 लोकों का प्रतीक हैं। गणेश विसर्जन अनासक्ति और आगमन-प्रस्थान चक्र की शिक्षा देता है।
bhadrapada शुक्ल
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bhadrapada कृष्ण
सूर्य कन्या राशि में प्रवेश – कन्या संक्रान्ति।
शुक्ल
bhadrapada कृष्ण
विघ्नहर्ता की मासिक पूजा। कृष्ण चतुर्थी (ढलते चन्द्र का 4वाँ दिन) पर।
bhadrapada कृष्ण
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कृष्ण के प्रति मासिक भक्ति भक्त को उनके प्रेम, कर्तव्य और समर्पण के उपदेशों से जोड़े रखती है।
bhadrapada कृष्ण
bhadrapada कृष्ण
पूर्वजों को कष्ट से मुक्ति। दिवंगत आत्माओं को शान्ति (पितृ मुक्ति)।
bhadrapada कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
bhadrapada कृष्ण
bhadrapada कृष्ण
दैवी स्त्री शक्ति (शक्ति) की बुराई पर विजय। नौ रूपों में से प्रत्येक स्त्री ऊर्जा के एक भिन्न पहलू का प्रतिनिधित्व करता है।
ashwina शुक्ल
bhadrapada कृष्ण
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सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
bhadrapada कृष्ण
ashwina शुक्ल
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गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
ashwina शुक्ल
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अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। भक्त साहस, नकारात्मकता से रक्षा और बाधाओं पर विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
ashwina शुक्ल
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ashwina शुक्ल
दुर्गाष्टमी नवरात्रि का सबसे शक्तिशाली दिन माना जाता है। अष्टमी-नवमी सन्धि पूजा सम्पूर्ण उत्सव का सबसे पवित्र अनुष्ठान है। दक्षिण भारत में इस दिन आयुध पूजा व्यापक रूप से मनायी जाती है।
ashwina शुक्ल
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दिव्य माँ के प्रति भक्ति का मासिक नवीनीकरण। दुर्गा शक्ति के रक्षात्मक, उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। नियमित अष्टमी पूजा भय दूर कर साहस प्रदान करती है।
ashwina शुक्ल
महानवमी नौ दिनों की देवी आराधना की पूर्णाहुति और दैवी स्त्री शक्ति की बुराई पर अन्तिम विजय का प्रतीक है। यह नये कार्य आरम्भ करने के तीन सबसे शुभ दिनों (त्रि-शक्ति) में से एक है।
ashwina शुक्ल
विजयादशमी – "विजय का दसवाँ दिन"। नए कार्य आरम्भ करने का सर्वाधिक शुभ दिन। रावण दहन दस दुर्गुणों के नाश का प्रतीक है।
ashwina शुक्ल
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पापों को नियन्त्रित और नष्ट करती है। मृत्यु के बाद वैकुण्ठ प्रदान करती है।
ashwina शुक्ल
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
ashwina शुक्ल
वर्ष की सबसे उज्ज्वल और पूर्ण चन्द्र रात्रि। चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है और उसकी किरणें औषधीय मानी जाती हैं।
ashwina शुक्ल
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ashwina कृष्ण
ashwina कृष्ण
सूर्य तुला राशि में प्रवेश – तुला संक्रान्ति।
शुक्ल
विघ्नहर्ता की मासिक पूजा। कृष्ण चतुर्थी (ढलते चन्द्र का 4वाँ दिन) पर।
ashwina कृष्ण
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कृष्ण के प्रति मासिक भक्ति भक्त को उनके प्रेम, कर्तव्य और समर्पण के उपदेशों से जोड़े रखती है।
ashwina कृष्ण
लक्ष्मी का आशीर्वाद, दरिद्रता दूर करती है। सभी तीर्थयात्राओं से अधिक पुण्यदायी।
ashwina कृष्ण
धनतेरस दीपावली के पाँच दिवसीय उत्सव का पहला दिन है। "धन" का अर्थ सम्पत्ति और "तेरस" त्रयोदशी। यह स्वास्थ्य, धन और समृद्धि का उत्सव है।
ashwina कृष्ण
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ashwina कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
ashwina कृष्ण
नरक चतुर्दशी बुराई के नाश और पीड़ितों की मुक्ति का प्रतीक है। भोर का स्नान पापों को धोता है और चौदह दीप चौदह लोकों को प्रकाशित करते हैं। यह दीपावली से पूर्व शुद्धिकरण का दिन है।
ashwina कृष्ण
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प्रकाश का त्योहार – अन्धकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान, बुराई पर अच्छाई की विजय। सबसे अन्धेरी रात (अमावस्या) को प्रकाशित किया जाता है।
ashwina कृष्ण
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सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
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गोवर्धन पूजा प्रकृति-भक्ति और आत्मनिर्भरता की शिक्षा देती है। कृष्ण ने दिखाया कि समुदाय का पोषण करने वाला पर्वत और गौएँ पूजा के योग्य हैं। यह दीपावली का चौथा दिन है।
kartika शुक्ल
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भाई दूज भाई-बहन के पवित्र बन्धन का उत्सव है। यह दीपावली का पाँचवाँ और अन्तिम दिन है। बहन का आशीर्वाद यम को भी दूर रखने में समर्थ माना जाता है।
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गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
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छठ एकमात्र वैदिक उत्सव है जो सूर्य की जीवनदायी शक्ति की उपासना को समर्पित है। यह बिहार, झारखण्ड और पूर्वी उत्तर प्रदेश का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। 36 घण्टे बिना भोजन-जल के कठोर व्रत के लिए प्रसिद्ध है।
kartika शुक्ल
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अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। भक्त साहस, नकारात्मकता से रक्षा और बाधाओं पर विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
kartika शुक्ल
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दिव्य माँ के प्रति भक्ति का मासिक नवीनीकरण। दुर्गा शक्ति के रक्षात्मक, उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। नियमित अष्टमी पूजा भय दूर कर साहस प्रदान करती है।
kartika शुक्ल
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चातुर्मास का अन्त। विवाह ऋतु का आरम्भ। अत्यन्त शुभ।
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तुलसी विवाह चार माह के चातुर्मास काल का अन्त और हिन्दू विवाह तथा शुभ कार्यों के पुनः आरम्भ का संकेत है। यह तुलसी (भक्ति) और विष्णु (दिव्यता) के शाश्वत बन्धन का प्रतीक है।
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त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
kartika शुक्ल
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कार्तिक पूर्णिमा वर्ष की सबसे पवित्र पूर्णिमा मानी जाती है। इस दिन गंगा स्नान सौ अश्वमेध यज्ञों का पुण्य देता है। पवित्र कार्तिक मास की पूर्णाहुति और देवताओं का दीपोत्सव।
kartika शुक्ल
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गुरु नानक जयन्ती सिख कैलेण्डर का पवित्रतम दिन है — सिख परम्परा के संस्थापक का जन्म जिनकी नदी-निमज्जन के पश्चात् प्रथम स्पष्ट शिक्षा थी "ना कोई हिन्दू, ना कोई मुसलमान।" दिन का लङ्गर — प्रत्येक गुरुद्वारा प्रत्येक राहगीर को धर्म-जाति-पृष्ठभूमि की परवाह बिना खिलाता, सब समान भूमि पर बैठ कर खाते — विश्व के किसी भी धार्मिक कैलेण्डर में उस शिक्षा का सर्वाधिक सार्वजनिक भौतिक अभिनय है।
kartika शुक्ल
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प्रत्येक पूर्णिमा का हिन्दू महीने के आधार पर विशेष नाम और महत्व है। पूर्णिमा प्रार्थना, ध्यान और दान के प्रभावों को बढ़ाती है।
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सूर्य वृश्चिक राशि में प्रवेश – वृश्चिक संक्रान्ति।
शुक्ल
विघ्नहर्ता की मासिक पूजा। कृष्ण चतुर्थी (ढलते चन्द्र का 4वाँ दिन) पर।
kartika कृष्ण
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कृष्ण के प्रति मासिक भक्ति भक्त को उनके प्रेम, कर्तव्य और समर्पण के उपदेशों से जोड़े रखती है।
kartika कृष्ण
सभी एकादशियों की "माता"। इसका पालन सभी एकादशी व्रतों का आधार है।
kartika कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
kartika कृष्ण
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सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
kartika कृष्ण
margashirsha शुक्ल
गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
margashirsha शुक्ल
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अधर्म पर धर्म की विजय का उत्सव। भक्त साहस, नकारात्मकता से रक्षा और बाधाओं पर विजय के लिए प्रार्थना करते हैं।
margashirsha शुक्ल
दिव्य माँ के प्रति भक्ति का मासिक नवीनीकरण। दुर्गा शक्ति के रक्षात्मक, उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं। नियमित अष्टमी पूजा भय दूर कर साहस प्रदान करती है।
margashirsha शुक्ल
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मोक्ष (पुनर्जन्म से मुक्ति) प्रदान करती है। इस दिन गीता पाठ सर्वोत्तम पुण्यदायी है।
margashirsha शुक्ल
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त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
margashirsha शुक्ल
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margashirsha शुक्ल
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सूर्य धनु राशि में प्रवेश – धनु संक्रान्ति।
शुक्ल
विघ्नहर्ता की मासिक पूजा। कृष्ण चतुर्थी (ढलते चन्द्र का 4वाँ दिन) पर।
margashirsha कृष्ण
margashirsha कृष्ण
कृष्ण के प्रति मासिक भक्ति भक्त को उनके प्रेम, कर्तव्य और समर्पण के उपदेशों से जोड़े रखती है।
margashirsha कृष्ण
सभी प्रयासों में सफलता (सफला) प्रदान करती है।
margashirsha कृष्ण
त्रयोदशी और संध्याकाल का संयोग शिव के लिए परम पवित्र है। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) शनि पीड़ा निवारण में विशेष शक्तिशाली है।
margashirsha कृष्ण
margashirsha कृष्ण
margashirsha कृष्ण
सबसे अन्धेरी रात – आत्मनिरीक्षण और पूर्वजों से जुड़ने के लिए आदर्श।
margashirsha कृष्ण
pausha शुक्ल
गणेश किसी भी हिन्दू अनुष्ठान में सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। मासिक चतुर्थी पूजा निरन्तर विघ्न निवारण और ज्ञान, सफलता के आशीर्वाद सुनिश्चित करती है।
pausha शुक्ल
तिथियाँ उज्जैन (23.18°N, 75.79°E) के लिए गणित – पारम्परिक हिन्दू प्रधान याम्योत्तर। सभी भारतीय नगरों के लिए ±30 मिनट के भीतर सटीक।