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देवउत्थान एकादशी कार्तिक शुक्ल एकादशी को पड़ती है। पूजा मध्याह्न मुहूर्त में की जाती है। तुलसी विवाह पारम्परिक रूप से अगले दिन (द्वादशी) को किया जाता है। इसी दिन चातुर्मास समाप्त होता है – शुभ कार्य पुनः आरम्भ हो सकते हैं।
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शंख बजाकर, घंटी बजाकर और "उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ गोविन्द" का जाप करके भगवान विष्णु को जगाएँ। विष्णु मूर्ति को शयन मुद्रा से उठाकर बैठी/खड़ी मुद्रा में रखें।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तमिदं भवेत्॥
uttiṣṭhottiṣṭha govinda tyaja nidrāṃ jagatpate | tvayi supte jagannātha jagat suptamidaṃ bhavet ||
उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ हे गोविन्द! निद्रा त्यागो, हे जगतपते। हे जगन्नाथ, जब तुम सोते हो तो सम्पूर्ण संसार सो जाता है।
विष्णु मूर्ति को पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी, शक्कर) और फिर स्वच्छ जल से स्नान कराएँ। सुखाकर पीला रेशमी वस्त्र पहनाएँ। चन्दन तिलक लगाएँ और तुलसी माला अर्पित करें।
षोडशोपचार से विष्णु पूजा करें। पीले फूल, तुलसी, कुमकुम, अक्षत, धूप और घी का दीपक अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम या चयनित स्तोत्रों का पाठ करें।
तुलसी के पौधे या पूजा स्थल के चारों ओर गन्ने की छड़ियों से सजावट करें। शुभ रंगोली के पैटर्न बनाएँ। गन्ना चातुर्मास के बाद लौटती मधुरता और समृद्धि का प्रतीक है।
घी के दीपक, कपूर और घंटी के साथ भगवान विष्णु की उत्साहपूर्ण आरती करें। यह उत्सव है – विष्णु जागृत हो गए हैं और शुभ कार्य पुनः आरम्भ हो रहे हैं। फल और मिठाइयाँ नैवेद्य के रूप में अर्पित करें।