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गंगा दशहरा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को पड़ता है। पूजा मध्याह्न में या शाम की गंगा आरती के समय नदी घाट पर करना श्रेष्ठ है। हस्त नक्षत्र में हरिद्वार, वाराणसी या प्रयागराज में गंगा स्नान सर्वोत्तम माना जाता है।
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गंगा या किसी निकटवर्ती नदी में पवित्र स्नान करें। नदी उपलब्ध न हो तो स्नान के जल में गंगाजल मिलाएँ। स्नान करते हुए दस पापों (काय, वाचा, मनस – तीन-तीन, और एक सार्वभौमिक) के शुद्धिकरण हेतु गंगा माता से प्रार्थना करें।
जल के निकट बैठें और छोटी वेदी रखें। जल में फूल, अक्षत, कुमकुम और हल्दी अर्पित करें। गंगा की छोटी मूर्ति पर या गंगा का प्रतिनिधित्व करने वाले कलश पर कुमकुम का तिलक लगाएँ।
दाहिने हाथ में जल और अक्षत लें। अपना नाम, गोत्र, तिथि (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) और उद्देश्य – दस पापों के निवारण हेतु गंगा माता की पूजा – बोलें। जल नदी में छोड़ें।
पत्तों की नावों पर दस घी के दीपक जलाएँ, प्रत्येक एक पाप के निवारण का प्रतीक। गंगा मंत्रों का जाप करते हुए उन्हें नदी में प्रवाहित करें। जैसे वे बहते जाएँ, इसे अपने पापों के प्रस्थान का प्रतीक मानें।
ॐ नमः शिवाय नारायणाय दशहराय गङ्गायै नमः। विष्णुपादाब्जसम्भूते गङ्गे त्रिपथगामिनि। धर्मद्रवेति विख्याते पापं मे हर जाह्नवि॥
oṃ namaḥ śivāya nārāyaṇāya daśaharāya gaṅgāyai namaḥ | viṣṇupādābjasambhūte gaṅge tripatthagāmini | dharmadraveti vikhyāte pāpaṃ me hara jāhnavi ||
ॐ, शिव, नारायण और दस पापों को हरने वाली गंगा को नमस्कार। हे गंगे, विष्णु के चरणकमलों से उत्पन्न, तीन लोकों में बहने वाली, धर्म की धारा के रूप में विख्यात – हे जाह्नवी, मेरे पापों को हर लो।
नदी के निकट बैठकर गंगा स्तोत्र या गंगा मंत्र का 108 बार जाप करें। गंगा माता की शुद्धिकारी ऊर्जा पर ध्यान केन्द्रित करें।
बड़े घी के दीपक और कपूर से गंगा आरती करें। "ॐ जय गंगे माता" या पारम्परिक गंगा आरती गाएँ। नदी की ओर दीपक को दक्षिणावर्त गोल घुमाएँ। लगातार घंटी बजाएँ।
ब्राह्मणों या ज़रूरतमंदों को दस वस्तुएँ दान करें – दस पापों के निवारण का प्रतीक। पारम्परिक दान में अनाज, वस्त्र, तिल और सोना (यथाशक्ति) शामिल हैं।