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ई संयुक्त लक्ष्मी-गणेश आरतीक अतीव महत्व अछि, विशेषतः दीपावलीक उत्सवसभक भक्तिमय चरमोत्कर्षक रूपमे। यद्यपि लक्ष्मीक पूजा परम्परागत रूपसँ शुक्रदिन धन-समृद्धिक लेल कएल जाइत अछि आ गणेशक पूजा मंगलदिन वा चतुर्थीक दिन विघ्न-बाधा दूर करबाक लेल, तथापि, पाँच दिवसीय दीपावली पर्वक समय हुनकर संयुक्त आह्वान सर्वोपरि अछि, विशेषतः मुख्य लक्ष्मी पूजाक दिन (कार्तिक अमावस्या) पर। आरती मुख्य पूजाक उपरान्त कएल जाइत अछि, सामान्यतः प्रदोष काल वा निशिता कालमे, जखन दिव्य ऊर्जासभ सर्वाधिक शक्तिशाली मानल जाइत अछि। एकर विधिमे प्रज्वलित कपूरक दीप (दीपक) – परम्परागत रूपसँ माटिक बनल, घी वा तिलक तेलमे भीजल सूती बातीक संग – देवतासभक समक्ष सामान्यतः तीन, पाँच वा सात बेर दक्षिणावर्त घुमाओल जाइत अछि, जे प्रकाश, उष्णता आ भक्तिक अर्पणक प्रतीक अछि। भक्तगण जीवनक विभिन्न चरणक चिन्तासभक समाधानक लेल एहि आरतीक शरण लैत छथि। गणेशक उपस्थिति नव उद्यम, अध्ययन वा जीवनक कोनो महत्वपूर्ण संक्रमणसँ विघ्न-बाधासभ (विघ्नहर्ता) कें दूर करबाक सुनिश्चित करैत अछि, एहि कारणसँ कोनो सेहो कार्यक आरम्भसँ पूर्व हुनकर आह्वान प्राथमिक देवताक रूपमे कएल जाइत अछि। लक्ष्मीक आह्वान भौतिक आ आध्यात्मिक समृद्धि (धन), प्रचुरता, सौभाग्य आ कल्याणक लेल होइत अछि। दीपावलीक समयमे, नव बही-खाताक आशीर्वादक लेल चोपडा पूजन करबाक प्रथा अछि, आ ई आरती एहन वित्तीय आरम्भकें पवित्र करैत अछि। एहि आरतीक सामूहिक गान, प्रायः घण्टा आ शंखक ध्वनिक संग, वातावरणकें शुद्ध करैत अछि आ आध्यात्मिक स्पन्दनकें उच्च करैत अछि। यद्यपि आरती स्वयंमे एकटा पूर्ण भक्तिमय कार्य अछि, तथापि ई गणेशक लेल 'ॐ गं गणपतये नमः' आ लक्ष्मीक लेल 'ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभ्यो नमः' जेकाँ प्राथमिक मंत्रसभक पूरकक रूपमे कार्य करैत अछि, एकटा सामुदायिक, सुलभ पूजा विधि प्रदान करैत। पाठक संख्याक लेल कोनो कठोर नियम नहि अछि, मुदा निष्ठा महत्वपूर्ण अछि। स्नान कय आ स्वच्छ वस्त्र धारण कय पूर्व-शुद्धिकरण परम्परागत अछि। ई आरती विभिन्न हिन्दू परम्परासभमे व्यापक रूपसँ अपनाओल जाइत अछि, विशेषतः उत्तर आ पश्चिम भारतमे, जतय दीपावलीकें अपार उत्साहक संग मनाओल जाइत अछि, जे आतिशबाजी, विस्तृत रंगोली आ अनगिनत दीपकसभक प्रज्वलनसँ चिह्नित होइत अछि, ई सब प्रकाश, ज्ञान आ समृद्धिक लेल एहि हार्दिक प्रार्थनामे परिणत होइत अछि।