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प्रत्येक तिथिक दू भाग, केवल ११ प्रकारसँ प्रति चान्द्रमास ६० करण बनैत अछि
करण पञ्चाङ्गक सबसँ छोट दैनिक विभाजन छी। ई अर्ध-तिथि छी – चन्द्रमा आ सूर्यक बीच ठीक ६ अंशक कोणीय अन्तर। 'करण' शब्द संस्कृत धातु 'कृ' (करब) सँ बनल अछि, जे ओइ समयावधिमे कार्यक गुणवत्ता देखबैत अछि।
मुहूर्तमे (निर्वाचन ज्योतिष) विशिष्ट कार्यक लेल समयक उपयुक्तता निर्धारित करबाक लेल करणक व्यापक उपयोग होइत अछि। सूर्य सिद्धान्त आ मुहूर्त चिन्तामणि जकाँ शास्त्रीय ग्रन्थमे संस्कार, यात्रा, कृषि आ वाणिज्यक लेल विशिष्ट करण निर्धारित अछि।
1 Karana = 6° of Moon-Sun elongation = ½ Tithi
1 Tithi = 12° = 2 Karanas
30 Tithis x 2 = 60 Karanas per lunar month
केवल ११ विशिष्ट करण प्रकार अछि, तैयो ओ प्रति चान्द्रमास ६० स्थानकेँ भरैत अछि। ई एहि लेल सम्भव अछि किएक तँ करण दू वर्गमे विभक्त अछि:
७ प्रकार जे ८ बेर दोहराएल जाइत अछि = ५६ स्थान (स्थान २ सँ ५७)
४ प्रकार जे केवल एक बेर अबैत अछि = ४ स्थान (स्थान १, ५८, ५९, ६०)
कुल: ५६ (चर) + ४ (स्थिर) = ६० करण = २ प्रति तिथि x ३० तिथि
चान्द्रमासमे करण संख्या (१-६०) चन्द्र-सूर्य अन्तरसँ सोझे प्राप्त होइत अछि:
Karana Position = floor((Moon° - Sun°) / 6) + 1
If elongation < 0, add 360° (normalize to 0-360)
Position 1 = Kimstughna (sthira)
Positions 2-57 = Chara cycle: (pos-2) mod 7 maps to Bava(0)...Vishti(6)
Positions 58,59,60 = Shakuni, Chatushpada, Naga (sthira)
मानि ली चन्द्रमा ८५.३ अंश पर अछि आ सूर्य ४२.७ अंश पर अछि।
अन्तर = ८५.३ - ४२.७ = ४२.६ अंश
दूटा करणक ठीक ६° सूर्य-चन्द्र कोणीय अन्तरसँ विभाजित करू
स्थान ८ चर चक्र (स्थान २-५७) मे अबैत अछि। ऑफसेट = (८ - २) mod ७ = ६, जे ७म चर करण = विष्टि (भद्रा) केँ देखबैत अछि।
ई शुक्ल चतुर्थी (चौथी तिथि) क दोसर भाग छी। ४२.६ अंशक अन्तर ४२ आ ४८ अंश (मासक ७म आ ८म करण) क बीचमे अछि।
Classification of 11 karanas and their assignment across the lunar month
प्रत्येक ११ करण पर एकटा देवताक अधिकार अछि आ ओकर एकटा विशिष्ट स्वभाव अछि जे ओइ अवधिमे कएल गेल कार्यक गुणवत्ताकेँ प्रभावित करैत अछि।
कार्य आरम्भक लेल उपयुक्तताक आधार पर करणकेँ तीन श्रेणीमे वर्गीकृत कएल जाइत अछि:
बव, बालव, कौलव, तैतिल, गरज -- ई पाँच चर करण विवाह, यात्रा, व्यापार आ धार्मिक कार्य सहित अधिकांश गतिविधिक लेल शुभ मानल जाइत अछि।
वणिज -- व्यापार आ वाणिज्यक लेल उपयुक्त, मुदा आध्यात्मिक वा गृह संस्कारक लेल अनुशंसित नहि। कृषिक लेल सेहो अनुकूल।
विष्टि (भद्रा) -- ७म चर करण अत्यन्त अशुभ मानल जाइत अछि। ई प्रति मास ८ बेर अबैत अछि आ सभ नव कार्य, यात्रा आ संस्कारमे त्याज्य अछि। केवल विध्वंस, संघर्ष आ युद्धक कार्य विष्टिमे विहित अछि।
चारि स्थिर करण चान्द्रमासक प्रारम्भ आ अन्तमे विशेष स्थान पर होइत अछि। ओ केवल एक बेर अबैत अछि, जाहिसँ ओ खगोलीय आ कर्मकाण्डीय दृष्टिसँ चर चक्रसँ भिन्न अछि।
औषधि निर्माण, विष सम्बन्धी कार्य, भविष्यवाणी, तान्त्रिक साधना
पशुपालन, पशु क्रय, पशु चिकित्सा, स्थिर आधार कार्य
क्रूर कर्म, विध्वंसक कार्य, भूमिगत कार्य। यात्रा और संस्कारों में त्याज्य
दान, आध्यात्मिक साधना, श्राद्ध, बाधा निवारण। एक आश्चर्यजनक शुभ स्थिर करण
मुहूर्त शास्त्रमे (निर्वाचन ज्योतिष), शुभ समय निर्धारणसँ पहिने मूल्यांकन करबाक पाँच अंगमे सँ (पंचांग) करण एकटा अछि। जखन कि तिथि आ नक्षत्र अधिक महत्वपूर्ण अछि, करण सूक्ष्म समायोजनक कार्य करैत अछि:
शुभ कार्यक लेल विष्टि (भद्रा) करण सर्वदा त्याज्य अछि। विष्टि मासमे ८ बेर अबैत अछि, ई उपलब्ध समयक लगभग १३% समाप्त कए दैत अछि।
बव आ बालव करण विशेष रूपसँ विवाह, उपनयन आ गृहारम्भक लेल अनुशंसित अछि।
वणिज करण नव व्यापार आरम्भ करब, अनुबन्ध हस्ताक्षर आ कृषि बुआइक लेल श्रेष्ठ अछि।
मासक सीमा पर स्थिर करण (शकुनि, चतुष्पद, नाग, किंस्तुघ्न) श्राद्ध, पशुपालन आ आध्यात्मिक साधना जकाँ विशिष्ट अनुष्ठानक लेल आरक्षित अछि।
प्रत्येक चान्द्रमासक ६० करण एकटा सटीक क्रम अनुसरण करैत अछि। एहि चक्रकेँ बुझब मासक कोनो बिन्दु पर सक्रिय करणक पूर्वानुमानक कुंजी अछि:
स्थान १ (शुक्ल प्रतिपदा, प्रथम भाग): किंस्तुघ्न (स्थिर) – मास अन्तिम स्थिर करणसँ प्रारम्भ होइत अछि, पुरान चक्रक विलयक प्रतीक।
स्थान २-५७ (शुक्ल प्रतिपदा दोसर भागसँ कृष्ण चतुर्दशी प्रथम भाग धरि): ७ चर करण क्रमानुसार ८ बेर चक्रित: बव, बालव, कौलव, तैतिल, गरज, वणिज, विष्टि।
स्थान ५८-६० (कृष्ण चतुर्दशी दोसर भाग, अमावस्या प्रथम आ द्वितीय भाग): शकुनि, चतुष्पद, नाग (स्थिर) – मास तीन स्थिर करणक संग अन्धकारमय चरणमे समाप्त होइत अछि।