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गंगा आरतीक नित्य अनुष्ठानक रूपमे गम्भीर महत्व अछि, विशेषतः सन्ध्याकालमे (सन्ध्या आरती) वाराणसी, हरिद्वार आ ऋषिकेश जकाँ नगरसभक पवित्र घाटसभ पर, जतय ई भक्ति केर एकटा भव्य प्रदर्शनमे परिणत भऽ जाइत अछि। यद्यपि ई कोनो दिन कएल जा सकैत अछि, तथापि किछु विशिष्ट पर्व-त्योहारक अवसर पर एकर शक्ति बढ़ि जाइत अछि। ज्येष्ठ शुक्ल दशमीक दिन मनाओल जाएवला गंगा दशहरा, गंगाक पृथ्वी पर अवतरणक स्मरण कराबैत अछि आ हुनकर पूजा लेल सबसँ शुभ समय मानल जाइत अछि, जतय आरती एकटा केन्द्रीय अनुष्ठान होइत अछि। अन्य महत्वपूर्ण कालखंडसभमे कार्तिक पूर्णिमा, मकर संक्रान्ति, आ पितृ पक्ष शामिल अछि, जखन पितृसभक मोक्ष लेल अर्पण कएल जाइत अछि। ई अनुष्ठान स्वयंमे अनेक बाती वला दीपकेँ, जे प्रायः घी वा कपूर सँ प्रज्वलित होइत अछि, गंगाक प्रतिमा वा स्वयं नदीक समक्ष घुमाओल जाइत अछि। प्रकाशक ई अर्पण अज्ञानताक नाश आ दिव्य ज्ञानक आह्वानक प्रतीक अछि। भक्तगण दक्षिणावर्त परिक्रमा करैत छथि, सामान्यतः तीन, पाँच वा सात बेर, दीप केर ज्वाला पर हाथ राखि आ ओकरा अपन आँखि आ माथ सँ लगाकय आशीर्वाद ग्रहण करैत छथि। आरती विभिन्न जीवन-चरणक चिन्तासभ लेल कएल जाइत अछि: पापक शुद्धि (पाप नाशन) आ कर्मक भार सँ मुक्ति सँ लऽ कऽ भौतिक समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य आ आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष) केर कामना धरि। एहन मानल जाइत अछि जे ई अकाल मृत्यु सँ रक्षा प्रदान करैत अछि आ शान्तिपूर्ण संक्रमण सुनिश्चित करैत अछि। भक्तगण प्रायः गंगाजीमे स्नान करैत छथि आ भाग लेबा सँ पहिने स्वच्छ वस्त्र धारण करैत छथि, दिव्य माता सँ अपन सम्बन्धकेँ आर गहिर करबाक लेल आरतीक संग-संग "ॐ नमो भगवत्यै गंगा देव्यै नमः" जकाँ मुख्य मंत्रसभक जप करैत छथि।