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करवा चौथ हिन्दू पंचांगमे गम्भीर सांस्कृतिक आ खगोलीय महत्व रखैत अछि, जे कार्तिक कृष्ण चतुर्थी – कार्तिक मासक कृष्ण पक्षक चारिम दिन – मनाओल जाइत अछि। ई आरती व्यापक चन्द्र-पूजा परम्परासँ गम्भीर रूपसँ जुड़ल अछि, जतय चन्द्रमा देवताकेँ 'अमृत' (सुधा) क स्रोत तथा स्वास्थ्य आ दीर्घायुक प्रदाताक रूपमे पूजल जाइत अछि। ई पर्व पौराणिक कथासभमे निहित अछि जे एकर सारकेँ रेखांकित करैत अछि। सावित्री आ सत्यवानक कथा, जतय सावित्रीक अटूट भक्ति अपन पतिकेँ यमक चंगुलसँ बचाओलनि, एहि व्रत लेल परम प्रेरणाक रूपमे काज करैत अछि। रानी वीरवतीक कथा, जे अपन व्रत समयसँ पहिने तोड़बाक कारणसँ परिणाम भोगलनि, व्रतक पवित्रता आ उचित पालनकेँ उजागर करैत अछि। पूजाक चारू दिस कलात्मक परम्परासभ फलिभूत होइत अछि, महिलासभक हाथकेँ सुशोभित करयवला जटिल 'मेहंदी' डिजाइनसँ लऽ कऽ 'करवा' पात्रक जीवंत सजावट धरि। पूजा, कथा-श्रवण आ आरती लेल 'सुमंगली' महिलासभक सामूहिक जुटान सामुदायिक बन्धन आ वैवाहिक सुखक लेल साझा आकांक्षासभकेँ सुदृढ़ करैत अछि, जे आरतीमे चन्द्रमाकेँ ओकर जीवन-पोषक आशीर्वाद लेल आह्वानक संग समाप्त होइत अछि।