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सन्तोषी माँ केर आरती मुख्य रूप सँ सन्तोषी माँ व्रत केर अनुष्ठानक समय गाओल जाइत अछि, जे एकटा भक्तिपूर्ण व्रत अछि आ परम्परागत रूप सँ सोलह लगातार शुक्रदिन कयल जाइत अछि। शुक्रदिन, जे शुक्र ग्रह सँ सम्बन्धित अछि आ प्रायः समृद्धि तथा कल्याणक देवीसभ सँ जुड़ल अछि, हुनकर पूजाक लेल विशेष रूप सँ शुभ मानल जाइत अछि। ई आरती पूजाक समापन पर कयल जाइत अछि, सामान्यतः देवताक समक्ष प्रज्वलित कपूरक दीप (दीया) घुमाबैत, जे प्रकाशक अर्पण आ अन्धकारक निवारणक प्रतीक अछि। भक्तगण, विशेष रूप सँ विवाहित महिलासभ, वैवाहिक सद्भाव, सन्तान प्राप्ति, पारिवारिक कल्याण, आर्थिक स्थिरता आ विशिष्ट इच्छासभक पूर्तिक लेल सन्तोषी माँक शरणमे जाइत छथि। अनुष्ठानिक शुद्धता (शुद्धि) सर्वोपरि अछि, गुड़ आ चना केर अर्पणक कठोर पालनक संग-संग खट्टा भोजनक पूर्ण त्याग अनिवार्य अछि। ई आहार सम्बन्धी प्रतिबन्ध मात्र प्रतीकात्मक नहि अछि; ई भक्तक कटुता आ नकारात्मकता त्यागबाक प्रतिबद्धताक प्रतिनिधित्व करैत अछि, मधुरता आ सन्तुष्टिक मानसिकताक पोषण करैत अछि, जे देवीक नामक प्रतिबिम्ब अछि। ई आरती सन्तोषी माँक प्राथमिक मन्त्रसभक पूरक अछि, भक्तिपूर्ण अनुभवकेँ तीव्र करैत अछि आ हुनकर आशीर्वादक आह्वान करैत अछि। एकर व्यापक लोकप्रियता, विशेष रूप सँ उत्तर भारतमे, एकर सुलभ अनुष्ठानसभ आ माईक तत्काल कृपा पर गहिर विश्वास सँ उपजल अछि, जे लोक हुनकर निष्ठापूर्वक पूजा करैत छथि आ निर्धारित व्रतकेँ अनुशासनक संग पालन करैत छथि।