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'सत्यनारायण आरती' अत्यन्त लोकप्रिय सत्यनारायण पूजाक अन्तिम आ महत्वपूर्ण अंग थिक, जे भारतवर्षमे व्यापक रूपसँ मनाओल जाइत अछि। ई पूजा मुख्य रूपसँ पूर्णिमा (पूणर् चन्द्रमाक दिन) आ गुरुवारक दिन कएल जाइत अछि, कारण गुरुवार परम्परागत रूपसँ भगवान विष्णु (बृहस्पति वा गुरुवर) सँ सम्बन्धित अछि। यद्यपि ई कोनो विशेष वार्षिक पर्व सँ नहि जुड़ल अछि, तथापि गृहप्रवेश, विवाह, नव काजक आरम्भसँ पहिने, वा महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्तिक अवसर पर ई प्रायः कएल जाइत अछि, कृतज्ञता व्यक्त करबाक आ निरन्तर आशीर्वादक लेल प्रार्थनाक रूपमे। आरतीक समयमे, देवताक चित्र वा मूर्तिक समक्ष प्रज्वलित कपूरक दीप (दीया) वा घृतक दीपकेँ दक्षिणावर्त दिशामे, सामान्यतः तीन, पाँच वा सात बेर घुमाओल जाइत अछि, जे प्रकाश, पवित्रता आ भक्तिक निवेदक प्रतीक थिक। ई दीप, प्रायः पीतल वा माटिक बनल होइत अछि, जाहिमे घृतमे भिंजल कपासक बाती वा प्रज्वलित कपूर राखल जाइत अछि, जे अन्धकार आ अज्ञानताक नाशकेँ दर्शावैत अछि। पूजा आ आरतीसँ पहिने, भक्तगण स्नान कय स्वच्छ वस्त्र धारण कयकेँ शारीरिक शुद्धिक पालन करैत छथि, आ पूजा स्थलकेँ दैवी उपस्थितिकेँ आमन्त्रित करबाक लेल पवित्र कएल जाइत अछि। भक्तगण जीवनक विभिन्न अवस्थामे उत्पन्न होनिहार अनेक चिन्ताक समाधानक लेल भगवान सत्यनारायणक शरणमे जाइत छथि: समृद्धि प्राप्तिक लेल, परिवारक कल्याण सुनिश्चित करबाक लेल, बाधासभकेँ दूर करबाक लेल, विशिष्ट संकल्प (सङ्कल्प) पूरा करबाक लेल, आ अपन प्रयासमे सफलता प्राप्त करबाक लेल। आरती, पाँच अध्यायवला सत्यनारायण व्रत कथाक पाठक संग, 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' जेकाँ प्राथमिक विष्णु मन्त्रसभक पूरकक रूपमे काज करैत अछि, भक्तिक अनुभवकेँ गहन करैत आ दैवी कृपाक कथासभकेँ सुदृढ़ करैत अछि। ई एकटा गैर-सांप्रदायिक वैष्णव अनुष्ठान थिक, जे अपन सुलभताक कारण आ ई विश्वासक कारण पोषित अछि जे एकर निष्ठापूर्वक सम्पादनसँ शान्ति, सुख आ धार्मिक इच्छासभक पूर्ति होइत अछि।