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शिव ताण्डव स्तोत्रम्क शैव धर्ममे अतीव महत्व अछि, मुख्य रूप सँ एकर रचना लंकाक पराक्रमी राजा रावण द्वारा कयल जेबाक कारणेँ। रामायणमे हुनका खलनायकक रूपमे चित्रित कयल जेबाक बावजूद, रावण भगवान शिवक अनुपम भक्त छलाह, एकटा महान विद्वान्, आ संगीत तथा वैदिक ज्ञानक धनी छलाह। कैलाश पर्वत उठयबाक प्रयासक उपरान्त शिवकेँ प्रसन्न करबाक लेल ओ ई स्तोत्रक रचना केलनि, जे हुनकर गहन तपस्या आ अटूट भक्ति प्रदर्शित करैत अछि। ई स्तोत्रक पाठ सँ शिवक शक्तिशाली उपस्थिति आ आशीर्वादक आह्वान होइत मानल जाइत अछि, जे प्रतिकूलताक सामना करबाक लेल साहस, शक्ति आ दृढ़ताक पोषण करैत अछि। भक्तगण प्रायः शिव ताण्डव स्तोत्रम्क पाठ भय पर विजय प्राप्त करबाक लेल, शत्रुसभ (आन्तरिक आ बाह्य दुनू) पर विजय प्राप्त करबाक लेल, आ आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त करबाक लेल करैत छथि। ई विशेष रूप सँ अधिक प्रभावशाली होइत अछि जखन एकर पाठ शुभ समयमे कयल जाइत अछि, जेना महाशिवरात्रि, प्रदोष व्रत (चन्द्रमासक तेरहम दिनक सन्ध्याकाल), आ सोमदिन, जे परम्परागत रूप सँ भगवान शिवकेँ समर्पित अछि। नियमित पाठ, प्रायः ११ वा १०८ क गुणजमे, मन आ शरीरकेँ शुद्ध करैत मानल जाइत अछि, जे अपन आध्यात्मिक अभ्यासकेँ बढ़ाबैत अछि। पाठ करबा सँ पहिने स्नान कय स्वच्छ, शान्त वातावरणमे बैसबाक प्रथा अछि, अपन मनकेँ शिवक दिव्य रूप पर केन्द्रित करैत। ई स्तोत्रम् अन्य प्रमुख शिव मन्त्रसभक पूरक अछि, जेना पञ्चाक्षरी मन्त्र (ॐ नमः शिवाय) आ महामृत्युञ्जय मन्त्र, शिवक उग्र तथापि परोपकारी स्वरूपसभ सँ आ हुनकर सृष्टि आ संहारक ब्रह्माण्डीय नृत्य सँ अपन सम्बन्धकेँ गहन करैत। ई आन्तरिक परिवर्तन आ अटूट भक्ति चाहैत छथि हुनका लेल एकटा शक्तिशाली साधन अछि।