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एकादशी व्रत दशमीक सूर्यास्तक बाद आरम्भ होइत अछि आ द्वादशीमे पारण (व्रत तोड़नाय) क' समाप्त होइत अछि। पूजा आदर्श रूपसँ ब्रह्म मुहूर्त वा भोरक समयमे एकादशी तिथि पर कएल जाइत अछि।
अहाँक स्थान खोजि रहल अछि...
दशमीक साँझमे (एकादशीसँ एक दिन पहिने), सूर्यास्तसँ पहिने हल्का सात्विक भोजन करू। भारी, तामसिक भोजनसँ बचू। व्रत करबाक लेल मानसिक रूपसँ सङ्कल्प करू। पूजा स्थानकेँ साफ करू आ सभ सामग्रीकेँ व्यवस्थित करू।
सूर्योदयसँ पहिने उठू। शुद्ध स्नान करू, आदर्श रूपसँ किछु बूँद गङ्गाजलक संग। साफ पीयर वा उज्जर वस्त्र धारण करू। वेदीक सोझाँ बैसू आ दाहिना हाथक हथेलीमे जल आ अक्षत ल'क' तिथि, उद्देश्य आ देवताक नाम ल'क' औपचारिक सङ्कल्प करू।
भगवान् विष्णु केर सोलह चरणक पूजा करू: आवाहन (आमन्त्रण), आसन (बैठक), पाद्य (पैर धोनाय), अर्घ्य (जल अर्पण), आचमनीय (जल पान), स्नान (पञ्चामृत आ जलसँ स्नान), वस्त्र (पीयर वस्त्र), यज्ञोपवीत (पवित्र धागा), गन्ध (चन्दन), पुष्प (तुलसीक संग फूल), धूप (अगरबत्ती), दीप (घीक दीप), नैवेद्य (मात्र फल – अन्न नहि), ताम्बूल (पान), प्रदक्षिणा (परिक्रमा), आ नमस्कार (प्रणाम)।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
oṃ namo bhagavate vāsudevāya
ॐ, हम भगवान वासुदेव (कृष्ण/विष्णु) केँ प्रणाम करैत छी, जे परम सत्ता छथि।
तुलसी गाछक विशेष पूजा करू, जे विष्णु केर सबसँ प्रिय पत्नी (वृन्दा देवी) छथि। तुलसी गाछमे जल दिय, ओकर जड़िमे कुमकुम आ हल्दी लगाउ, फूल चढ़ाउ आ तुलसी लग एकटा दीया जड़ाउ। तुलसी गाछक तीन बेर परिक्रमा करू।
श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रक पाठ करू (महाभारतक अनुशासन पर्वसँ विष्णु केर १००० नाम)। एकादशीक लेल ई सबसँ अधिक पुण्यदायक पाठ अछि। यदि समय नहि भेटय, तँ कमसँ कम विष्णु अष्टोत्तर शतनामावली (१०८ नाम) केर पाठ करू।
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥
śuklāmbaradharaṃ viṣṇuṃ śaśivarṇaṃ caturbhujam | prasannavadanaṃ dhyāyet sarvavighnopaśāntaye ||
हम भगवान विष्णुक ध्यान करैत छी, जे श्वेत वस्त्र धारण करैत छथि, जे चन्द्रमाक समान कान्तिवला छथि, जे चारि भुजावला छथि, आ जिनकर मुख शान्त अछि – समस्त बाधासभक निवारणक लेल।
भगवान विष्णु, कृष्ण वा रामक स्तुतिमे भक्ति गीत (भजन) आ कीर्तन गाउ। लोकप्रिय विकल्पमे "हरे कृष्ण महा मन्त्र", "श्री राम जय राम" आ "अच्युतम केशवं" शामिल अछि। ई व्यक्तिगत रूपसँ वा समूहमे कयल जा सकैत अछि।
भगवान विष्णु केर साँझक आरती घीक दीया आ कपूरसँ करू। "ॐ जय जगदीश हरे" – सार्वभौमिक विष्णु आरती – गाउ। घंटी बजाउ आ सभ परिवारक सदस्यसभकेँ ज्योति देखाउ।
रातिभरि जागल रहू (जागरण) विष्णु कथा सुनैत, भजन गाबैत, भगवद् गीता पढ़ैत वा ध्यान करैत। ई ऐच्छिक अछि मुदा व्रत केर पुण्यमे बहुत वृद्धि करैत अछि। मध्यरात्री धरि जागल रहब सेहो पुण्यदायक अछि।
द्वादशीक भोरमे, प्रातःकालीन स्नान आदि करू आ संक्षिप्त विष्णु पूजा करू। व्रत पारण (parana) सूर्योदयक बादे आ पारणक निर्धारित समयक भीतर (सामान्यतः दिनक एक चौथाई भाग बीतबा सँ पहिने) करू। तुलसी जल सँ प्रारम्भ करू, तखन फल, तखन हल्का भोजन करू। अपन भोजन करबा सँ पहिने ब्राह्मणकेँ भोजन कराबय अत्यधिक पुण्यदायक अछि।