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प्रदोष काल ओ १.५ घण्टाक अवधि अछि जे त्रयोदशी (१३म तिथि) पर सूर्यास्तक तुरन्त बाद शुरू होइत अछि। समस्त पूजा विधि एहि सन्ध्याकालक अवधिमे अवश्य करबाक चाही। एहि समयमे शिव अपन ब्रह्माण्डीय ताण्डव नृत्य करैत छथि आ भक्तसभक लेल सर्वाधिक सुलभ होइत छथि।
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त्रयोदशीक दिनभरि उपवास राखू। कठोरतापूर्वक पालन करयवला लोक निर्जला (जल बिना) उपवास करैत छथि, जखन कि आन लोक फल, दूध आ जल ल' सकैत छथि। यदि आंशिक उपवास क' रहल छी तँ सूर्यास्तसँ पहिने एक बेर भोजन करू। दिनभरि भक्तिपूर्ण गतिविधि आ शिवक स्मरणमे व्यतीत करू।
सूर्यास्तसँ पहिने पवित्र स्नान करू। स्वच्छ उज्जर वस्त्र वा रुद्राक्षक माला धारण करू। पूजाक स्थानकेँ शिवलिङ्ग वा शिवक चित्रसँ सजाऊ। सभ सामग्री – दूध, जल, बेलपत्र, उज्जर फूल, धतूरा, विभूति, दीप आ धूप – क' व्यवस्था करू।
जेनाहि सूर्य अस्त होइत अछि आ प्रदोष काल आरम्भ होइत अछि, घीक दीप आ धूप जराऊ। आचमन (तीन बेर जल पान) करू। दाहिन हाथमे जल, अक्षत आ फूल ल' क' सङ्कल्प करू, जहिमे तिथि, स्थान आ उद्देश्यक उल्लेख करू।
शिवलिङ्गक अभिषेक (पवित्र स्नान) करू। "ॐ नमः शिवाय" क' जप करैत धीरे-धीरे लिङ्ग पर दूध चढ़ाऊ। तखन स्वच्छ जल (यदि उपलब्ध हो तँ गङ्गाजल) चढ़ाऊ। अभिषेक भक्तिपूर्वक करबाक चाही, दूध आ जलकेँ ऊपरसँ धीरे-धीरे बहय दिअ।
ॐ नमः शिवाय
oṃ namaḥ śivāya
ॐ, हम भगवान शिवकेँ प्रणाम करैत छी – जे शुभ छथि, परिवर्तन करयबला छथि, परम चेतना छथि।
शिवलिङ्ग पर ताजा तीन पातवला बेल (बिल्व) पत्र चढ़ाऊ – ओकरा चिकना दिस ऊपर दिस आ डण्ठी अपन दिस क' क' राखू। धतूराक फल आ फूल चढ़ाऊ। लिङ्गक चारू दिस उज्जर फूल (चमेली वा उज्जर कमल) राखू। चन्दनक लेप आ विभूति लगाऊ।
शिवलिङ्गक सोझाँ घीक दीप (दूटा बाती बला होय तँ नीक) जराबू। रुद्राक्षक मालासँ पञ्चाक्षरी मन्त्र (ॐ नमः शिवाय) १०८ बेर जप करू। तखन महा मृत्युञ्जय मन्त्र १०८ बेर पाठ करू। एहि पूरा समयमे एकाग्रता आ भक्ति बनाए राखू – ईएह प्रदोष पूजाक मूल अछि।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
oṃ tryambakaṃ yajāmahe sugandhiṃ puṣṭivardhanam | urvārukamiva bandhanān mṛtyormukṣīya māmṛtāt ||
ॐ, हम त्रिनेत्रधारी (शिव) क पूजा करैत छी, जे सुगन्धित छथि आ सभ प्राणीक पोषण करैत छथि। जेना काँकड़ी अपन लता सँ कटि जाइत अछि, तेना हमरा सभकेँ मृत्यु सँ मुक्ति भेटय, अमरता सँ नहि।
रावण द्वारा रचित शिव ताण्डव स्तोत्रक पाठ करू – ई प्रदोषक लेल विशेष रूपसँ उपयुक्त अछि कारण एहि समयमे शिव ताण्डव करैत छथि। यदि सक्षम छी तँ श्री रुद्रम् (यजुर्वेदसँ नमकम आ चमकम) सेहो पाठ करू। नहि तँ शिव चालीसा वा कोनो शिव स्तोत्रक पाठ करू।
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्। डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥
jaṭāṭavīgalajjalapravāhapāvitasthale gale'valambye lambitāṃ bhujaṅgatuṅgamālikām | ḍamaḍḍamaḍḍamaḍḍamannināḍavaḍḍamarvayaṃ cakāra caṇḍatāṇḍavaṃ tanotu naḥ śivaḥ śivam ||
जकर जटा सँ पवित्र गङ्गा प्रवाहित भऽ भूमिकेँ पवित्र करैत छथि, जे अपन गरदन मे विशाल सर्प सभक माला धारण करैत छथि, जे अपन डमरू (डा-डा-डा-डम्) क ताल पर उग्र ताण्डव नृत्य करैत छथि – ओ शिव हमरा सभ पर शुभता प्रदान करथि।
घीक दीप आ कपूरसँ आरती करू, "ॐ जय शिव ओंकारा" गाबैत। शिवलिङ्गक सोझाँ दीपकेँ दक्षिणावर्त दिशामे घुमाबू। आरतीक बाद, शिवलिङ्गक प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करू – ध्यान राखू: शिवलिङ्गक लेल अर्ध-वृत्त करू (बामासँ दाहिना दिस जाउ आ ओहिना वापस आउ, अभिषेकक जल निकासीक मार्गकेँ पार नहि करू)।
भगवान शिवकेँ नैवेद्य (फल, मिठाई, दूध) अर्पित करू। शिवक प्रसादक रूपमे अपन कपार पर विभूति (भस्म) लगाबू। सभ प्राणीक कल्याणक लेल प्रार्थना करू। पूजा सम्पन्न भेलाक बाद सात्विक भोजनसँ व्रत तोड़ू। प्रदोष कालक समय सीमा समाप्त हेबाक पहिने पूजा सम्पन्न भऽ जेबाक चाही।