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मिथिला कैलेंडर मैथिल ब्राह्मणों और व्यापक मैथिली-भाषी समुदायों का पारम्परिक पंचांग है — मिथिलांचल उत्तरी बिहार, झारखण्ड के कुछ भागों और नेपाल के तराई में फैला एक सांस्कृतिक क्षेत्र है। सुधारित बंगाली या तमिल कैलेंडर के विपरीत, मिथिला पंचांग शास्त्रीय चान्द्र-सौर प्रणाली (पूर्णिमान्त) को बनाए रखता है जहां मास पूर्णिमा पर समाप्त होते हैं। यह कैलेंडर क्षेत्र में सभी धार्मिक अनुष्ठानों, विवाहों, उपनयन संस्कारों और कृषि चक्रों को नियंत्रित करता है। 3.5 करोड़ से अधिक मैथिली भाषी इस कैलेंडर का उपयोग करते हैं।
मिथिला कैलेंडर पूर्णिमान्त प्रणाली का पालन करता है, जहां प्रत्येक मास पूर्णिमा पर समाप्त होता है। मास मानक हिन्दू चान्द्र-सौर मासों से मेल खाते हैं लेकिन मिथिला की विशिष्ट उत्सव परम्परा का सांस्कृतिक भार वहन करते हैं। चैत्र वर्ष का आरम्भ है।
| # | मास | मैथिली | ग्रेगोरियन |
|---|---|---|---|
| 1 | चैत्र | चैत | Mar–Apr |
| 2 | वैशाख | बैसाख | Apr–May |
| 3 | ज्येष्ठ | जेठ | May–Jun |
| 4 | आषाढ़ | आषाढ़ | Jun–Jul |
| 5 | श्रावण | सावन | Jul–Aug |
| 6 | भाद्रपद | भादो | Aug–Sep |
| 7 | आश्विन | आश्विन | Sep–Oct |
| 8 | कार्तिक | कातिक | Oct–Nov |
| 9 | मार्गशीर्ष | अगहन | Nov–Dec |
| 10 | पौष | पूस | Dec–Jan |
| 11 | माघ | माघ | Jan–Feb |
| 12 | फाल्गुन | फागुन | Feb–Mar |
छठ पूजा (कार्तिक शुक्ल षष्ठी) मिथिलांचल और भोजपुरी-मैथिली बेल्ट का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। सूर्य देव और छठी मइया (ऊषा) को समर्पित, यह उन दुर्लभ वैदिक त्योहारों में से है जो पौराणिक आवरण के बिना जीवित रहे। 4-दिवसीय पालन — नहाय खाय (दिन 1: स्नान और लौकी-चने की दाल), खरना/लोहंडा (दिन 2: 36 घंटे का निर्जला व्रत खीर खाकर आरम्भ), सन्ध्या अर्घ्य (दिन 3: कमर तक पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य), और ऊषा अर्घ्य (दिन 4: उगते सूर्य को अर्घ्य, फिर प्रसाद से व्रत तोड़ना)। भक्त "ठेकुआ" और "कसार" जैसे पारम्परिक प्रसाद "दउरा" (बांस की टोकरी) में तैयार करते हैं। यह त्योहार पूर्णतः पुजारी-रहित है — "व्रती" स्वयं सभी अनुष्ठान करते हैं।
मिथिला का कैलेंडर मधुबनी (मिथिला) चित्रकला से अविभाज्य है। कैलेंडर बताता है कि घरों की दीवारों पर कब नई चित्रकारी करनी है: विवाह के लिए कोहबर, त्योहारों के लिए अरिपन (फर्श चित्रकला), और विशिष्ट देवताओं की चित्रकारी। कला प्राकृतिक रंगद्रव्यों — हल्दी पीला, नील नीला, दीपक कालिख काला, चावल का सफेद — का उपयोग करती है। UNESCO ने मधुबनी कला को GI उत्पाद के रूप में मान्यता दी है।
रामनवमी (मिथिला सीता की भूमि — विशेष महत्व), चैती छठ (वसन्त छठ पूजा)
अक्षय तृतीया (कृषि वर्ष आरम्भ), सीता नवमी (मिथिला में विशेष सीता पूजा)
बटसावित्री (ज्येष्ठ पूर्णिमा — सुहागिनें बरगद के नीचे पति की दीर्घायु के लिए व्रत)
रथ यात्रा, गुरु पूर्णिमा, चातुर्मास आरम्भ
मधुश्रावणी (नवविवाहिताओं का मास-भर अनुष्ठान), नाग पंचमी, रक्षा बंधन, कजरी तीज
जन्माष्टमी (दही हांडी), हरतालिका तीज (सुहागिनों का व्रत), गणेश चतुर्थी, विश्वकर्मा पूजा
जितिया/जीवित्पुत्रिका (माताओं का 3 दिन निर्जला व्रत — सबसे कठोर व्रत), नवरात्रि, दशहरा, कोजागरा पूर्णिमा
छठ पूजा (कार्तिक शुक्ल षष्ठी — मिथिला का परिभाषित पर्व), दीवाली, सामा-चकेवा (भाई-बहन का अनूठा मिट्टी पक्षी पर्व), भाई दूज
विवाह पंचमी (राम-सीता विवाह वर्षगांठ — जनकपुर में भव्य), मोक्षदा एकादशी
मकर संक्रान्ति / तुसू पूजा (तिलकुट और लाई-चूड़ा वितरण), पौष पूर्णिमा
सरस्वती पूजा / वसन्त पंचमी (विद्या की पूजा), माघी पूर्णिमा
महा शिवरात्रि, होली / फगुआ (मैथिली "फाग" गीतों से — अनूठी संगीत परम्परा), होलिका दहन