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8 गौरी काल (अमृत, सिद्ध, मरण, रोग, लाभ, धन, सुगम, शोक), साप्ताहिक क्रम और दैनिक समय-निर्धारण में उपयोग
गौरी पंचांग (गौरी नल्ल नेरम) पारम्परिक वैदिक समय-विभाजन प्रणाली है जो प्रत्येक दिन और रात को लगभग 90 मिनट की 8 बराबर अवधियों में बाँटती है। यह उत्तर भारत में प्रचलित चौघड़िया का दक्षिण भारतीय समकक्ष है — दोनों की अल्गोरिथमिक संरचना समान है (सूर्योदय से सूर्यास्त तक 8 भाग, सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक 8 भाग), परन्तु गौरी 8 अलग काल-नामों और भिन्न वार-चक्र का प्रयोग करती है। यह तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में प्रचलित है। चौघड़िया में 'चर' (तटस्थ) काल है, गौरी में कोई तटस्थ श्रेणी नहीं — हर काल या शुभ है (अमृत, सिद्ध, लाभ, धन, सुगम) या अशुभ (मरण, रोग, शोक)।
8 काल इस क्रम में चलते हैं: अमृत (अमृत — सर्वाधिक शुभ), सिद्ध (कार्य-सिद्धि), मरण (मृत्यु — अशुभ), रोग (रोग — अशुभ), लाभ (लाभ), धन (धन), सुगम (सुख-सुविधा), शोक (दुःख — अशुभ)। प्रत्येक वार अलग स्थान से प्रारम्भ होता है (जैसे सोमवार अमृत से, क्योंकि सोम=चन्द्र=अमृत)। 8 स्लॉट के बाद चक्र पूरा होता है; रात्रि का चक्र 4 स्थान आगे से प्रारम्भ होता है।
प्रत्येक वार दिन-गौरी चक्र अलग स्थान से प्रारम्भ करता है। रविवार शोक से, सोमवार अमृत से, मंगलवार मरण से, बुधवार लाभ से, गुरुवार सुगम से, शुक्रवार सिद्ध से, शनिवार रोग से। 8 स्लॉट पूर्ण होने के बाद, रात्रि-गौरी दिन के प्रारम्भिक स्थान से 4 कदम आगे प्रारम्भ होती है।
| वार | पहला गौरी |
|---|---|
| रविवार | शोक |
| सोमवार | अमृत |
| मंगलवार | मरण |
| बुधवार | लाभ |
| गुरुवार | सुगम |
| शुक्रवार | सिद्ध |
| शनिवार | रोग |
नया व्यापार आरम्भ या गृह-प्रवेश के लिए — अमृत सबसे शक्तिशाली। वित्तीय निर्णय: लाभ या धन। यात्रा और परिवार: सुगम। परीक्षा, अनुबंध: सिद्ध। मरण, रोग, शोक काल में कोई शुभ कार्य न करें। राहु काल, यमगण्ड या गुलिक काल से अमृत गौरी का अतिव्यापन हो तो भी सावधानी — पारम्परिक तमिल और कन्नड़ पंचांग में अशुभ आवरण प्राथमिकता पर है।
लाभ, धन
सुगम, अमृत
अमृत, सिद्ध
राहु काल, यमगण्ड, या गुलिक काल में अमृत गौरी हो तो भी सावधानी बरतें — अशुभ आवरण प्राथमिकता पर है।
दोनों प्रणालियाँ समान काल-विभाजन संरचना साझा करती हैं — 8 दिन के स्लॉट, 8 रात के, सूर्योदय-सूर्यास्त से गणना। अंतर: (1) गौरी में 8 भिन्न काल-नाम; चौघड़िया में 7 (चर पुनरावृत्ति)। (2) गौरी में कोई तटस्थ श्रेणी नहीं। (3) वार-चक्र अलग। (4) गौरी दक्षिण भारत की पारम्परिक प्रणाली; चौघड़िया उत्तर-पश्चिम भारत में।