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देवता: भगवान शिव
प्रदोष व्रत समुद्र मंथन के दौरान शिव द्वारा सृष्टि की रक्षा हेतु हालाहल विष पान की स्मृति है। कथा बताती है कैसे पार्वती ने विष रोकने के लिए उनका गला दबाया (नीलकण्ठ बनाया), और कैसे नन्दी की तपस्या ने प्रदोष संध्या काल को शिव पूजा की सर्वाधिक शक्तिशाली अवधि स्थापित किया।
मास में दो बार — शुक्ल और कृष्ण पक्ष दोनों की त्रयोदशी (13वीं तिथि) को। पूजा प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद 90 मिनट की संध्या अवधि) में होती है। शनि प्रदोष विशेष शक्तिशाली है।
प्रदोष व्रत से भगवान शिव का शीघ्र आशीर्वाद मिलता है। यह सभी पाप नष्ट करता है, मनोकामना पूर्ण करता है, समृद्धि लाता है, रोग दूर करता है, और मोक्ष प्रदान करता है।
सूर्योदय से व्रत रखें। सन्ध्या में प्रदोष काल (सूर्यास्त के 1.5 घंटे बाद) शिव मन्दिर जाएं। दूध, जल, मधु, दही से अभिषेक करें। बिल्वपत्र, श्वेत पुष्प, धतूरा, भस्म अर्पित करें। घी का दीया जलाएं। महामृत्युंजय मन्त्र 108 बार जपें और सम्भव हो तो शिव रुद्रम् पाठ करें। शिवलिंग की 3 बार परिक्रमा करें। पूजा के बाद व्रत तोड़ें।
प्रदोष व्रत एक पवित्र ग्रन्थ है जिसे उसके पारम्परिक रूप में पढ़ना चाहिए। प्रामाणिक पूर्ण पाठ के लिए अपने पारिवारिक पण्डित या विश्वसनीय प्रकाशन से परामर्श करें।