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देवता: सन्तोषी माता
सन्तोषी माता सन्तोष की देवी हैं, भगवान गणेश की दिव्य शक्ति से जन्मी। कथा सत्यवती की है, एक प्रताड़ित बहू जिसने 16 लगातार शुक्रवार के व्रतों से आन्तरिक शांति पाई और अपनी परिस्थितियां बदलीं। यह दर्शाती है कि इस व्रत में खट्टा भोजन कभी नहीं खाना या अर्पित करना चाहिए।
प्रत्येक शुक्रवार, 16 लगातार शुक्रवार। उद्यापन समारोह (8 बालकों को भोजन) के साथ समापन।
सन्तोषी माता व्रत सन्तोष, पारिवारिक सद्भाव, गृह कलह का समाधान, आर्थिक स्थिरता और लम्बित मनोकामनाओं की पूर्ति लाता है।
16 लगातार शुक्रवार व्रत करें। सवेरे उठें, स्नान करें, चना और गुड़ के प्रसाद से सन्तोषी माता की पूजा करें। घी का दीया जलाएं। इस दिन कुछ भी खट्टा (नीम्बू, इमली, अचार, दही, सिरका) न खाएं न अर्पित करें। एक सात्विक भोजन करें। 16 शुक्रवार बाद उद्यापन करें: 8 बालकों को भोजन कराएं, दक्षिणा दें, प्रसाद वितरित करें।
सन्तोषी माता व्रत एक पवित्र ग्रन्थ है जिसे उसके पारम्परिक रूप में पढ़ना चाहिए। प्रामाणिक पूर्ण पाठ के लिए अपने पारिवारिक पण्डित या विश्वसनीय प्रकाशन से परामर्श करें।