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व्यावसायिक पंचांग कभी-कभी ±1 दिन के अन्तर से क्यों भिन्न होते हैं – और कौन सी पद्धति अपनाएँ
दुनू पद्धति एकहि खगोल विज्ञानक उपयोग करैत छथि – वैह चन्द्रमा, वैह तिथि, वैह सूर्योदय समय। मतभेद केवल एहि बातपर अछि जे जखन तिथि दू दिनमे पसरल हो तँ कोन नियम लागू कएल जाय। स्मार्त परम्परा आवश्यक काल विन्डोपर तिथिक उपयोग करैत अछि (राम नवमी लेल मध्याह्न, जन्माष्टमी लेल निशीथ)। वैष्णव परम्परा अतिरिक्त रूपसँ कोनो 'विद्ध' (दूषित) तिथिकें अस्वीकार करैत अछि आ अगिला दिन व्रत रखैत अछि जखन तिथि 'शुद्ध' होइ।
उदय तिथि (सूर्योदयपर तिथि) कें मूल नियमक रूपमे उपयोग करैत अछि। जँ तिथि आवश्यक काल विन्डो (मध्याह्न, निशीथ, प्रदोष आदि) पर व्याप्त हो, तँ ओ दिन चुनल जाइत अछि। विद्ध तिथिकें अस्वीकार नहि करैत अछि। धर्मसिन्धु (1790 ई.) आ निर्णयसिन्धु (1612 ई.) केर प्राधिकारक पालन करैत अछि। अधिकांश हिन्दू परिवार आ भारतक मुख्यधारा व्यावसायिक पंचांग एहि पद्धतिक उपयोग करैत छथि।
'विद्ध' (दूषित) तिथिकें अस्वीकार करैत अछि। जँ सूर्योदयपर पछिला तिथि विद्यमान रहए – आवश्यक तिथिकें थोड़बो 'स्पर्श' करै हो – तँ त्योहार अगिला दिन खिसकि जाइत अछि जखन तिथि 'शुद्ध' होइ। हरि भक्ति विलास (16म शताब्दी, गोपाल भट्ट गोस्वामी) आ नवद्वीप पंजिकाक पालन करैत अछि। ISKCON केन्द्र, गौड़ीय वैष्णव, आ श्री वैष्णव एकर अनुसरण करैत छथि।