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विष्णु आरती भक्तगणक लेल गम्भीर आध्यात्मिक महत्व रखैत अछि, ई भक्ति (ईश्वरक प्रति अनुराग) क' एकटा प्रबल अभिव्यक्ति तथा भगवत्-सम्पर्कक एकटा माध्यमक रूपमे काज करैत अछि। परम्परागत रूपसँ ई पूजाक समापनमे, विशेषतः साँझक वा भोरक समयमे, प्रज्वलित कपूरक दीप (दीया) क' देवताक समक्ष घुमाओल जाइत काल गाओल जाइत अछि। दीप घुमाबक ई क्रिया, जे प्रकाशक अर्पणक प्रतीक अछि, वातावरणक' शुद्ध करैत अछि आ दिव्य उपस्थितिक' आह्वान करैत अछि, जखन कि स्वयं ज्वाला आत्माक आन्तरिक प्रकाशक प्रतिनिधित्व करैत अछि। भक्तगण प्रायः बृहस्पतिदिन (बृहस्पतिवार) ई आरती करैत छथि, जे भगवान् विष्णु आ हुनकर विभिन्न स्वरूपसभ, जाहिमे बृहस्पति (गुरु) सेहो सम्मिलित छथि, जे ज्ञान आ समृद्धिसँ जुड़ल छथि, क' समर्पित दिन अछि। वैकुण्ठ एकादशी, जन्माष्टमी, राम नवमी आ देवशयनी एकादशी जकाँ प्रमुख वैष्णव पर्वसभक समयमे एकर पाठ तीव्र भ' जाइत अछि, जखन आध्यात्मिक ऊर्जासभक' सर्वाधिक शक्तिशाली मानल जाइत अछि। आरतीक लेल उपयोग कएल जाइवला दीप सामान्यतः घी (शुद्ध घृत) वा तेलसँ, सूती बातीक संग, प्रज्वलित कएल जाइत अछि आ दक्षिणावर्त दिशामे, सामान्यतः तीन, पाँच, सात वा एगारह बेर घुमाओल जाइत अछि, जे परिक्रमा (प्रदक्षिणा) आ पञ्चतत्वक अर्पणक प्रतिनिधित्व करैत अछि। भक्तगण जीवनक अनेक स्थितिमे एहि आरतीक शरण लेत छथि। मानल जाइत अछि जे ई बाधासभ, नकारात्मक प्रभावसभ आ कर्मक बोझसँ विष्णु भगवानक रक्षाक आह्वान करैत अछि। अनेक लोक भौतिक आ आध्यात्मिक समृद्धि, स्थिरता, मनक शान्ति आ दुःखक निवारणक लेल एकर पाठ करैत छथि, जे विष्णु भगवानक वक्षस्थल पर लक्ष्मीक उपस्थितिसँ मेल खाइत अछि। ई 'ॐ नमो नारायणाय' वा विष्णु सहस्रनाम जकाँ प्राथमिक मंत्रसभक पाठक पूरक अछि, जे भक्ति अनुभवक' गम्भीर करैत अछि। ई आरती भारत भरिक वैष्णव परम्परासभमे एकटा मुख्य अंग अछि, जे सामुदायिक भावनाक' बढ़ावा दैत अछि आ धर्म तथा सदाचारक सिद्धान्तसभक' सुदृढ़ करैत अछि। पाठसँ पहिने, अर्पणक ईमानदारी आ प्रभावशीलता सुनिश्चित करबाक लेल मानसिक आ शारीरिक शुद्धता पर जोर देल जाइत अछि।