होली 2029
होली 2029 लेल सटीक तिथि, पूजा मुहूर्त आ शहरक अनुसार समय
मुख्य जानकारी
पर्वक तिथि
Wednesday, February 28, 2029
2029 कें पंचांग संदर्भ
दिन
बुधवार
विक्रम संवत्
2086
शक संवत्
1951
This year Holi falls on a Wednesday, 11 days earlier than 2028 (2028-03-11) — typical lunar-calendar drift.
City-Wise Timings for Holi 2029
| शहर | सूर्योदय | सूर्यास्त |
|---|---|---|
| दिल्ली | 6:47 AM | 6:20 PM |
| मुंबई | 6:58 AM | 6:43 PM |
| बेंगलुरु | 6:36 AM | 6:28 PM |
| चेन्नई | 6:25 AM | 6:17 PM |
| कोलकाता | 5:58 AM | 5:39 PM |
| पुणे | 6:54 AM | 6:39 PM |
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होली 2029 आपकी राशि के लिए क्या लाता है?
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होली — क्या करें, क्या न करें
धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु, एवं समकालीन परम्परा से।
करने योग्य
- Use natural (gulal, herbal) colors rather than synthetic chemical ones.
- Offer the first colored handful to elders by touching their feet.
- Reconcile with anyone you have quarrelled with this past year.
- Share thandai, gujiya, or other traditional sweets with neighbors.
- Apply mustard oil or coconut oil on skin and hair before playing — easier color removal.
- Light Holika Dahan with sustainable wood and offer roasted grain — ritual closure.
न करें
- Do not throw colors at someone who has not consented or at vulnerable people.
- Avoid colors near eyes, in food, and on animals.
- Do not consume bhang to excess — moderate intake only, never if driving.
- Do not waste water — Holi already has a heavy water footprint.
- Avoid forcing colors on those abstaining (children, elders, ill, mourning families).
- Do not throw water-balloons at moving vehicles — accidents are common.
होली 2029 शुभकामनाएँ — साझा करने योग्य संदेश
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May the colour that finds you today be the one you were quietly missing. Happy Holi.
Bhang or thandai, lawn or balcony, family or friends — whatever shape your Holi takes today, may it leave you washed clean. Happy Holi.
May the fire of Holika Dahan burn what no longer serves you, and may tomorrow's colours paint what does. Shubh Holi.
Holi is the festival that says: the boundaries you draw at the office aren't the only ones. Wishing you the day off without guilt.
Throw the colour at someone who has been kind to you this year. Holi is gratitude that stains.
होलिका दहन एवं होली — पर्व क्रम
The Phalguna full-moon bonfire (Holika Dahan) and the colour-throwing day after (Holi) are a two-day Mars-driven sequence of release and renewal.
होली वर्षों में — २०२०-२०३०
पिछले एवं भविष्य के वर्षों की तिथियाँ — एक स्थान पर।
ई तिथि किएक?
Holi follows the Udaya Tithi rule – the festival is observed on the day when the required tithi prevails at sunrise. This is the default Dharmasindhu convention for festivals without a special time-window requirement.
पूजा विधि
पूजाक चरण
- 1
होलिका चिताक तैयारी
गोबरक उपला, काठीक लट्ठा आ सूखल टहनी जमा करू। खुल्ला स्थान मे चिता बनाउ, जकर बीच मे प्रह्लादक प्रतिनिधित्व करैत काठीक खम्...
- 2
पूजा स्थापना
चिताक नजदीक एकटा जलक लोटा राखू। कुमकुम, अक्षत, फूल, नारियल आ अन्य सामग्री एकटा थाली मे सजाउ।
- 3
सङ्कल्प
दाहिन हाथमे जल आ अक्षत लिय, तिथि, स्थान आ होलिका दहनक उद्देश्य कहू, फेर जल छोड़ू।
फल (लाभ)
समस्त बुराई आ नकारात्मकताक विनाश (जेना होलिका जरल छल), आसुरी शक्तिसँ रक्षा, वातावरणक शुद्धिकरण, अत्याचार पर भक्ति केर विजयक उत्सव, आ आनन्द आ भाइचाराक संग वसन्त ऋतु केर आगमन।
देवता
भगवान विष्णु (प्रह्लाद के रक्षक)
कथा आ इतिहास
होली दू पर्व एक संग — पूर्व सन्ध्या कें अग्नि-रात्रि आ अगिला रङ्ग-दिवस। एकर प्रत्येक भाग एक अलग पौराणिक कथा सँ जुड़ल अछि। पूरा कथा पढू →कम देखाबू ↑
होली दू पर्व एक संग — पूर्व सन्ध्या कें अग्नि-रात्रि आ अगिला रङ्ग-दिवस। एकर प्रत्येक भाग एक अलग पौराणिक कथा सँ जुड़ल अछि।
रात्रि कें मूल कथा प्रह्लाद कें अछि। भागवत पुराण कें अनुसार दैत्यराज हिरण्यकशिपु ब्रह्मा सँ अइसन वरदान पाओल जे ओकरा अमर मानि लेल — न मनुष्य न पशु, न दिन न रात्रि, न भीतर न बाहर, न शस्त्र न हस्त, न पृथ्वी न आकाश मे ओकर वध। ओ अपन के एकमात्र देव घोषित कयलक आ विष्णु-पूजा वर्जित कयलक। मुदा ओकर पुत्र प्रह्लाद बचपन सँ विष्णु कें स्मरण करैत रहल। हिरण्यकशिपु विष, हाथी, सर्प, पर्वत — सब प्रकार सँ वध कें प्रयास कयलक, हर बेर विष्णु आन्तरिक रक्षा कयलनि। अन्त मे ओ अपन बहीन होलिका कें बजाओलक, जे अग्नि-निरोधक वस्त्र कें वर पाओल छलि। होलिका प्रह्लाद कें गोद मे लय चिता मे बैसलि। धर्म कें वायु पलटि गेल: वस्त्र होलिका कें कन्ध सँ उड़ि कय प्रह्लाद कें ढाँकि देलक, आ होलिका भस्म भय गेलि, बालक अक्षत बाहर आबि गेलाह। आगाँ विष्णु नृसिंह रूप मे स्तम्भ सँ प्रकट भेलाह — न नर न मृग — सन्ध्या मे, देहरी पर, नख सँ हिरण्यकशिपु कें विदारण कयलनि। फाल्गुन पूर्णिमा कें पूर्व सन्ध्या मे होलिका दहन ओही अहङ्कार कें दहन आ भक्त कें रक्षा कें स्मरण अछि।
रङ्ग-दिवस कें कथा वृन्दावन सँ अछि। बाल कृष्ण, पूतना कें विष सँ श्यामल वर्ण, यशोदा सँ पुछैत छथि जे गोर राधा हुनका सँ कियैक भिन्न अछि। यशोदा हँसि कय कहैत छथि — जे रङ्ग चाही ओहि सँ हुनकर मुख रङ्गि दिअ। कृष्ण आँगन सँ गुलाल लय राधा आ सखिआ पर डालैत छथि।
तेसर कथा शिव पुराण सँ अछि — कामदेव कें शिव कें तृतीय नेत्र सँ भस्म कयल गेल, फाल्गुन पूर्णिमा कें। होली मे ताहि कें मौन स्मरण अछि।
एहि तीन कथा कें गूँथ दू-दिवसीय आकार बुझबैत अछि: रात्रि कें अग्नि शुद्धि आ धर्म-विजय कें स्मरण; दिन कें रङ्ग ओकर बाद कें मुक्ति कें उत्सव।
कनाय पालन करब
पूर्व संध्या: होलिका दहन – अलाव जलाएँ, परिक्रमा करें। अगले दिन: रंगों से खेलें (गुलाल, पिचकारी), ठण्डाई पिएँ, गुजिया खाएँ। मित्रों और परिवार से मिलें।
महत्व
अच्छाई (प्रह्लाद की भक्ति) की बुराई (हिरण्यकशिपु के अहंकार) पर विजय। वसन्त, नवीनता और सामाजिक एकता का उत्सव।
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