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धर्मकर्माधिपतियोगः
निर्माण नियम
नवम स्वामी (धर्म) आ दशम स्वामी (कर्म) युति, परस्पर दृष्टि, वा राशि-परिवर्तनमे होथि
उदाहरण कुण्डली
मेष लग्न उदाहरण — वास्तविक स्थिति भिन्न हो सकती है
धर्म-कर्माधिपति योग सर्वाधिक शक्तिशाली विशिष्ट राज योग मानल जाइत अछि, जे नवम स्वामी (धर्म, भाग्य, पिता, दर्शन) आ दशम स्वामी (कर्म, कैरियर, सार्वजनिक कार्य)कें एकत्र करैत अछि। जखन भाग्य कर्मसँ मिलैत अछि, तँ असाधारण उपलब्धि होइत अछि।
ई योग एहन नेता उत्पन्न करैत अछि जे भाग्यशाली सेहो होइत छथि आ परिश्रमी सेहो, आशीर्वाद प्राप्त सेहो आ उद्यमी सेहो। हुनकर कैरियर हुनकर उच्चतर उद्देश्यसँ मेल खाइत अछि। सफलता धर्मानुकूल कार्यसँ आइत अछि — ओ सफल होइत छथि कारण ओ योग्य छथि।
उद्देश्यसँ जुड़ल कैरियर
धर्मानुकूल कार्यसँ कैरियर-सफलता। भाग्य आ परिश्रम मिलि असाधारण उपलब्धि दैत अछि।
ई योगवला व्यक्ति सभ प्रायः एहन करियर मार्गक अनुभव करैत छथि जे गहिर रूपसँ उद्देश्यपूर्ण लगैत अछि, जतय हुनकर व्यावसायिक कार्य हुनकर नैतिक दिशासँ मेल खाएत अछि। ओ लोकनि लगनशील प्रयास आ भाग्यशाली परिस्थितिक मेलसँ प्रभावशाली पदसभपर पहुँचबाक प्रवृत्ति रखैत छथि, अपन नैतिक नेतृत्वक लेल सम्मान अर्जित करैत छथि। हुनकर स्वभाव सामान्यतः संतुलित महत्वाकांक्षा आ ईमानदारीक होइत अछि, जे दीर्घकालिक सफलता आ सार्वजनिक मान्यता दिस लऽ जाइत अछि।
योगक प्रबल प्रभाव सामान्यतः नवमेश वा दशमेशक दशा वा अन्तर्दशा कालमे, वा ओ ग्रहसभक दशामे प्रकट होइत अछि जे हुनकासँ दृष्ट वा युत छथि। ई काल प्रायः महत्वपूर्ण करियर उन्नति आ धर्मपूर्ण कार्यक अवसर लबैत अछि।
शास्त्रीय सन्दर्भ
धर्मकर्माधिपौ युक्तौ राजयोगप्रदौ परौ। यश्च धर्मे रतो नित्यं कर्मणा च महीपतिः॥
– BPHS, Chapter 41