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राजयोगः
निर्माण नियम
केन्द्र (१, ४, ७, १०)क स्वामी आ त्रिकोण (१, ५, ९)क स्वामी युति, परस्पर दृष्टि, वा राशि-परिवर्तनमे होथि
उदाहरण कुण्डली
मेष लग्न उदाहरण — वास्तविक स्थिति भिन्न हो सकती है
राज योग वैदिक ज्योतिषमे सभसँ महत्त्वपूर्ण योगक श्रेणी अछि। ई तखन बनैत अछि जखन केन्द्र (केन्द्र) घरक आ त्रिकोण (त्रिकोण) घरक स्वामी युति, परस्पर दृष्टि, वा राशि-परिवर्तनक माध्यमसँ एकत्र होइत छथि। ई संयोजन शक्ति (केन्द्र) आ भाग्य (त्रिकोण)कें एकत्र करैत अछि।
सर्वाधिक शक्तिशाली राज योगमे लग्न, पंचम, आ नवम स्वामी (त्रिकोण) लग्न, चारिम, सातम, वा दशम स्वामी (केन्द्र)संग मिलैत छथि। लग्नेश दुनूमे सहभागी होथि तँ सभसँ शक्तिशाली संस्करण बनैत अछि।
सभ राज योग समान नहि होइत अछि। एकर शक्ति सम्बन्धित ग्रहक बल, ओ कोन घरमे छथि, आ पाप ग्रहसँ पीड़ित छथि वा नहि, एहि पर निर्भर करैत अछि। दू नीच ग्रहक बारहम घरमे राज योग तकनीकी रूपसँ विद्यमान अछि मुदा व्यावहारिक रूपसँ कमजोर अछि।
शक्ति आ अधिकार
सत्ताक पदमे उत्थान, नेतृत्व, सरकारी अधिकार, सामाजिक प्रतिष्ठा।
धन आ भाग्य
शक्ति आ भाग्यक संयोजनसँ पर्याप्त धन-संचयक अवसर बनैत अछि।
एहि योगवला व्यक्ति सामान्यतः महत्वपूर्ण ऊर्ध्वगामी गतिशीलता आ सार्वजनिक पहचान सँ चिह्नित जीवन पथक अनुभव करैत छथि। ओ प्रायः स्वयंकेँ अधिकारक पद पर पाबैत छथि, संगठनक नेतृत्व करैत वा नीतिसभकेँ प्रभावित करैत। हुनकर करियरक मार्ग अंतर्निहित क्षमता आ सौभाग्यपूर्ण परिस्थितिक मिश्रण सँ विशिष्ट होइत अछि, जे हुनका अपन चुनल क्षेत्र वा समाजमे धन संचय करबाक आ सम्मान प्राप्त करबाकमे सक्षम बनाबैत अछि।
एहि राजयोगक फल सामान्यतः योग बनयवला ग्रहसभक दशा वा अंतर्दशा कालमे, वा ओहि भावक स्वामीक दशामे जतय योगक निर्माण होइत अछि—विशेषतः यदि ओ बलवान होथि—प्रकट होइत अछि।
शास्त्रीय सन्दर्भ
केन्द्रत्रिकोणाधिपयोर्दशासु राजप्रदो योग इति प्रदिष्टः।
– BPHS, Chapter 41