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Deity: भगवान गणेश
गणेश चतुर्थी भगवान गणेशक जन्मोत्सव मनाबैत अछि। ई कथा बताबैत अछि जे कोना पार्वती अपन गोपनीयताक रक्षा लेल हल्दीक लेपसँ गणेशक रचना केलथि, कोना शिव अनजानेमे बालकक मस्तक काटि देलथि, आ कोना हुनका हाथीक मस्तक लगा क' पुनर्जीवित कएल गेल आ 'प्रथम पूज्य' – अर्थात सभ देवतासभसँ पहिने पूजल जायवला – घोषित कएल गेल।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (भाद्रपद मासक शुक्ल पक्षक चतुर्थी तिथि) – सामान्यतः अगस्त/सितम्बर मासमे पड़ैत अछि। ई पर्व १.५, ३, ५, ७ वा १० दिन धरि मनाओल जाइत अछि।
गणेश चतुर्थीक पूजा सभ बाधाकेँ दूर करैत अछि, बुद्धि प्रदान करैत अछि, शिक्षा आ व्यवसायमे सफलता, नव काजक आरम्भमे रक्षा तथा समृद्धि लानैत अछि। कोनो नव काजक आरम्भसँ पहिने भगवान गणेशक आह्वान कएल जाइत अछि।
माटिक गणेश प्रतिमा स्थापित करू। मंत्रसभक संग प्राण प्रतिष्ठा (आह्वान) करू। २१ मोदक, २१ दूर्वा घासक गुच्छा, लाल फूल आ सिन्दूर अर्पित करू। घीक दीप जराबू। गणपति अथर्वशीर्ष वा "Om Gan Ganapataye Namah" क १०८ बेर जप करू। कपूरसँ आरती करू। अन्तिम दिन "Ganpati Bappa Morya, Purchya Varshi Laukarya!" कहैत विसर्जन करू।
कैलाश पर्वत पर, भगवान शिव का धाम, जहां शिखर आकाश को भेदते हैं और पवन दिव्य औषधियों की सुगन्ध लाती है, देवी पार्वती अपने पति के साथ निवास करती थीं। उनका प्रेम वह अक्ष था जिस पर ब्रह्माण्ड घूमता है – शिव चेतना, पार्वती शक्ति, मिलकर वह पूर्ण सत्य जिससे समस्त अस्तित्व प्रवाहित होता है। फिर भी स्वर्ग में भी, देवी कभी-कभी स्वयं को अकेला पातीं, क्योंकि शिव का स्वभाव विचरणशील था। वे बिना सूचना तपस्या के लिए प्रस्थान कर जाते, दूरस्थ गुफाओं में वर्षों ध्यान करते जो क्षणों जैसे लगते, या अपने गणों और भूत-प्रेतों की संगति में श्मशान भूमि में घूमते। पार्वती यह देवी के धैर्य से सहती थीं – अर्थात् आकाश जैसा विशाल धैर्य, किन्तु सीमाहीन नहीं। उनकी परिचारिकाएं थीं – जया और विजया, द्वारपाल – और गण, शिव के उन्मत्त परिचारक। किन्तु गण शिव के प्राणी थे, पहले उनके प्रति वफादार और पार्वती के प्रति विस्तार से। जब वे स्नान करतीं, एकान्त नहीं मिलता। जब एकान्त चाहतीं, कहीं नहीं मिलता। एक दिन, जब शिव अपनी बिना-सूचना यात्राओं में से एक पर गये थे, पार्वती ने उस पवित्र स्रोत में स्नान करने का निश्चय किया जो उनके निवास के निकट चट्टानों से बहता था। किन्तु पार्वती चाहती थीं एकान्त – सच्चा एकान्त, ऐसे रक्षक द्वारा सुनिश्चित जो केवल उन्हीं की आज्ञा माने। वे अपने कक्ष में गईं और वह हल्दी का लेप एकत्र किया जो वे त्वचा के लिए प्रयोग करती थीं – हल्दी, चन्दन, और पवित्र जड़ी-बूटियों का सुगन्धित स्वर्णिम मिश्रण। अपने दिव्य हाथों से, वे लेप को आकार देने लगीं। उन्होंने मूर्तिकार की एकाग्रता और माता के प्रेम से काम किया, क्योंकि वे मात्र आकृति नहीं, एक आत्मा रच रही थीं। उन्होंने एक शीश गढ़ा – गोल, बड़ी बुद्धिमान आंखों और कोमल मुख वाला। एक शरीर – बलवान किन्तु आतंकारी नहीं, रक्षा के लिए बना, आक्रमण के लिए नहीं। चार भुजाएं दीं, क्योंकि दिव्य कार्य में मानवीय क्षमता से अधिक चाहिए। और उसकी नासिका में प्राण फूंके – साधारण प्राण नहीं, बल्कि अपनी स्वयं की शक्ति की चिनगारी, वह आदि ऊर्जा जो ब्रह्माण्ड को चलाती है। बालक ने आंखें खोलीं। उसकी आंखें श्याम कमल की पंखुड़ियों के रंग की थीं, गहरी और दीप्तिमान, और उन्होंने पार्वती पर तत्काल पहचान और असीम प्रेम से दृष्टि स्थिर की। "मां," उसने कहा – इस नवीन प्राणी का पहला शब्द, और वह शब्द जिसने उसके सम्पूर्ण अस्तित्व को परिभाषित किया। पार्वती का हृदय उमड़ पड़ा। कैलाश पर पहली बार, उनके पास कोई था जो पूर्णतः, सम्पूर्णतः, निःसन्देह उनका था। अपना सन्तान – अपने सार से जन्मा, अपनी इच्छा के प्रति निष्ठावान, अपनी शक्ति से रचित। उन्होंने उसे गले लगाया, सुन्दर वस्त्र पहनाए, आभूषण सजाए, और एक दण्ड दिया। "तू मेरा पुत्र है," उन्होंने कहा। "तेरा नाम गणेश है – गणों का स्वामी, समस्त बाधाओं का अधिपति। और मेरे पास तेरे लिए एक कार्य है। इस द्वार पर खड़ा रह। किसी को – किसी को भी, चाहे कोई भी होने का दावा करे – मेरे स्नान के समय प्रवेश मत करने देना। यह मेरा स्थान है, और तू इसका रक्षक है।" गणेश द्वार पर खड़ा हुआ। वह बालक था – वस्तुतः अभी-अभी जन्मा – किन्तु उसकी दिव्य उत्पत्ति ने उसे ऐसी उपस्थिति दी जो उसकी आयु से कहीं आगे थी। उसकी दृष्टि शान्त थी। उसकी मुद्रा स्थिर। उसका दण्ड उस सहज आत्मविश्वास से पकड़ा था जो उस प्राणी का होता है जो ठीक-ठीक जानता है कि वह कौन है और किसलिए रचा गया है। समय बीता। पार्वती शान्ति से स्नान करती रहीं, युगों में पहली बार सच्चे एकान्त का सुख लेती। और तभी शिव लौटे। महादेव पर्वतीय पथ पर चढ़ते आ रहे थे, जटाएं झूलती हुईं, त्रिशूल चमकता, नन्दी पीछे-पीछे। वे प्रसन्न थे, भ्रमण के बाद प्रिय पार्वती से मिलने को उत्सुक। वे अपने निवास के द्वार पर पहुंचे – और एक बालक ने मार्ग रोका। "तुम कौन हो?" शिव ने पूछा, उनकी वाणी में उसका सहज अधिकार था जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की आज्ञाकारिता का अभ्यस्त है। "मैं गणेश हूं," बालक ने स्थिर स्वर में उत्तर दिया। "मैं पार्वती मां का पुत्र हूं, और उन्होंने मुझे आज्ञा दी है कि उनके स्नान के समय किसी को प्रवेश न करने दूं।" शिव की भौंहें ऊपर उठीं। "पुत्र? पार्वती का कोई पुत्र नहीं। मैं उनका पति हूं, और यह मेरा घर है। हट जाओ, बालक।" "मेरी माता ने कहा कोई प्रवेश नहीं करेगा," गणेश ने कहा। "उन्होंने कोई अपवाद नहीं किया।" जो हुआ उसके बाद पर्वत हिल गया। शिव ने अपने गण भेजे – बालक को हटाने। गणेश ने सबको पराजित किया। उसका दण्ड चक्रवात-सा घूमा। गण तूफान में पत्तों की भांति हवा में उड़े। एक भी उसे छू नहीं सका, क्योंकि वह पार्वती की शक्ति से बना था। शिव ने कार्तिकेय भेजा – अपना स्वयं का दिव्य पुत्र, दिव्य सेनाओं का सेनापति। कार्तिकेय ने अपने वेल से आक्रमण किया और ऐसे प्रतिरोध से मिला जिसने उसे चकित किया। द्वार का बालक मात्र बलवान नहीं था; वह अचल था। अब तक, शिव की चिड़चिड़ाहट ब्रह्माण्डीय क्रोध में बदल चुकी थी। तृतीय नेत्र – शिव का परम अस्त्र – झिलमिलाने लगा। किन्तु तृतीय नेत्र अकेला भी गणेश पर विजय नहीं पा सकता था, क्योंकि बालक की रक्षा स्वयं शक्ति से थी। भगवान विष्णु ने हस्तक्षेप किया – गणेश पर आक्रमण करने नहीं, बल्कि ध्यान भटकाने। अपनी दिव्य माया से, विष्णु ने एक क्षण के लिए गणेश का ध्यान खींचा। और उसी क्षण, शिव ने प्रहार किया। उनका त्रिशूल ध्वस्त होते ब्रह्माण्ड की शक्ति से उतरा। फाल ने, जो अस्तित्व और अनस्तित्व के बीच की सीमा से भी तीक्ष्ण था, गणेश का शीश धड़ से अलग कर दिया। वह सुनहरा शीश – जो पार्वती ने अपने हाथों से इतने प्रेम से गढ़ा था – बालक के कन्धों से उड़ा और कैलाश के चट्टानी फर्श पर लुढ़कता हुआ पर्वत के किनारे से नीचे दूर के वनों में गायब हो गया। शरीर ढह गया। दण्ड खड़खड़ाता हुआ गिरा। और द्वार खुला खड़ा रहा। जो मौन हुआ वह ब्रह्माण्ड के श्वास रोके रखने का मौन था। पार्वती स्नान से बाहर आईं। उन्होंने अपने पुत्र का शीशविहीन शव देखा – वह पुत्र जिसे उन्होंने मात्र घण्टों पहले अपने हाथों से रचा था – देहली पर अपने रक्त के पोखर में पड़ा। और पार्वती का शोक सृष्टि की सबसे खतरनाक शक्ति बन गया। वे चीखीं – और वह चीख मात्र ध्वनि नहीं थी। वह शक्ति का उन्मोचन था, ब्रह्माण्डीय स्त्री-शक्ति का कच्चा बल, और इसने सत्ता की नींव कंपा दी। "किसने किया यह?" वे गरजीं। "किसने मारा मेरे पुत्र को?" जब उन्हें पता चला शिव ने – उनके अपने पति ने – उनका शोक ऐसे प्रकोप में बदल गया जो ब्रह्माण्ड को पूर्ववत् करने की धमकी देता था। "तुमने एक बालक को मारा जो अपना कर्तव्य ही कर रहा था! वह मेरी आज्ञा पालन कर रहा था! मेरी गरिमा की रक्षा कर रहा था!" वे रूपान्तरित होने लगीं। कोमल पार्वती विलीन हो रही थीं, और उनके स्थान पर वे रूप उभर रहे थे जो ब्रह्माण्ड ने कभी न देखने की आशा की थी – काली, अन्धकार-विनाशिनी, दुर्गा, अजेय योद्धा। "यदि मेरा पुत्र जीवित नहीं किया गया," पार्वती ने घोषणा की, "तो मैं इस सृष्टि को विलीन कर दूंगी। प्रत्येक लोक, प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक अणु – उस शून्य में लौट जाएगा जहां से मैंने उन्हें बुलाया।" देवता घबराए। ब्रह्मा ने विनती की। विष्णु ने परामर्श दिया। और शिव – शिव, जिन्होंने क्रोध में कार्य किया, जिन्होंने माता की रक्षा को अज्ञात की अवज्ञा समझा – ने अपनी भूल समझी। केवल कूटनीतिक त्रुटि नहीं, बल्कि गहनतम विफलता: उन्होंने वह नष्ट किया जो प्रेम ने रचा था, क्योंकि वे रुककर पूछने के लिए बहुत अभिमानी थे। "मेरे गणों को उत्तर दिशा भेजो," शिव ने आज्ञा दी, उनकी वाणी अब पश्चाताप से भारी। "उन्हें उत्तर की ओर मुख किए प्रथम जीवित प्राणी मिले, उसका शीश लेकर आएं।" गण उत्तर में उड़े और वन के एक स्थान पर उत्तर की ओर मुख किए सोता एक विशाल गजराज पाया। वह वृद्ध हाथी था, बुद्धिमान और गरिमामय, अपने प्राकृतिक जीवन के अन्त में। गणों ने श्रद्धापूर्वक उसका शीश लिया और कैलाश लौटे। शिव ने गज-शीश गणेश के शरीर पर रखा। उन्होंने शीश और शरीर के जोड़ पर हाथ रखे और अपनी दिव्य ऊर्जा उंडेल दी। धीरे-धीरे, गज की धूसर त्वचा बालक के स्वर्णिम शरीर से जुड़ गई। विशाल कान फड़के। सूंड़ मुड़ी। और वे आंखें – वही बड़ी, दीप्तिमान, कमल-श्याम आंखें – पुनः खुलीं। "मां," गणेश ने फिर कहा – वही पहला शब्द, उसी असीम प्रेम से, किन्तु अब उस मुख से जिसे संसार अनन्तकाल तक पहचानेगा। पार्वती अपने पुत्र पर गिर पड़ीं, ऐसे आनन्द से रोती हुईं जिसने कैलाश के फूलों को ऋतु से बाहर खिला दिया। उन्होंने उसके गज-शीश को छाती से लगाया और उसके चौड़े ललाट को चूमा। शिव, जो पहले कभी इतने विनम्र नहीं हुए थे, गणेश के सामने घुटने टेके। "मैंने तुम्हारे साथ अन्याय किया," उन्होंने कहा। "और मैं ठीक करूंगा। आज से, तुम सभी देवताओं से पहले पूजे जाओगे – मुझ सहित। कोई पूजा, कोई संस्कार, कोई शुभ कार्य तुम्हारा नाम लिए बिना आरम्भ नहीं होगा। तुम गणपति हो – समस्त गणों के स्वामी। तुम विघ्नहर्ता हो – समस्त बाधाओं को हरने वाले। तुम प्रथम पूज्य हो। और यह दिन – भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी – तुम्हारे जन्म दिवस के रूप में मनाया जाएगा, मोदकों और दूर्वा और सबके प्रेम के साथ।" और गणेश ने, अपने नव-जुड़े गज-नेत्रों में भी स्पष्ट उस शान्त बुद्धि के साथ, शिव को देखा और कहा: "पिताजी, आपने वह किया जो आपने ठीक समझा। और मैंने वह किया जो मैं ठीक जानता था। मेरे हृदय में कोई क्रोध नहीं। मुझे अपना आशीर्वाद दीजिए, और मां को अपना प्रेम। बस इतना ही मैं मांगता हूं।" उस क्षण, शिव ने कुछ समझा जो संसारों के संहारक ने भी पूर्णतः नहीं जाना था: कि ब्रह्माण्ड में सबसे बड़ी शक्ति विनाश की शक्ति नहीं – क्षमा की शक्ति है। इति अध्याय सम्पूर्ण। भगवान गणेश की पूजा यह जानकर करो कि वे माता के प्रेम से जन्मे, पिता के क्रोध से परीक्षित, और परिवार की शक्ति से पुनर्स्थापित हुए। वे प्रत्येक द्वार पर खड़े हैं, प्रत्येक बाधा हरते हैं, और केवल मोदक और तुम्हारी भक्ति मांगते हैं। गणपति बप्पा मोरया।
गणेश चतुर्थी व्रत is a sacred text that deserves to be read in its traditional form. We recommend consulting your family pandit or a trusted publication for the authentic full text.