अक्षय तृतीया 2027
अक्षय तृतीया 2027 का पर्व शनिवार, शनिवार, 8 मई 2027. तिथि: vaishakha shukla 3.
अक्षय तृतीया 2027 की सटीक तिथि, पूजा मुहूर्त व शहर-वार समय
प्रमुख जानकारी
त्योहार की तिथि
शनिवार, 8 मई 2027
2027 पंचांग संदर्भ
वार
शनिवार
विक्रम संवत्
2084
शक संवत्
1949
इस वर्ष अक्षय तृतीया शनिवार को पड़ रहा है, 2026 (2026-04-19) से 19 दिन बाद — सामान्य चन्द्र-पंचांग बदलाव।
Falling on a Saturday brings a Shani emphasis — ancestral rites and black-sesame offerings carry extra weight, mitigating Shani's shadow.
The 2026 observance fell on Sunday, 2026-04-19 — this year arrives 19 days later in the Gregorian calendar, the Adhika-masa pattern when an intercalary lunar month pushes the cycle forward.
Looking ahead to 2028, Akshaya Tritiya will fall on Thursday, 2028-04-27 (10 days earlier than this year). So planning ritual schedules across years means anchoring to the tithi rather than the Gregorian date.
Astronomical context for Akshaya Tritiya 2027
On Saturday, May 8, 2027, sunrise in Delhi (the reference city for this page) falls at 05:35 IST and sunset at 19:00 IST — a daylight span of 13h 25m. Across the six pan-Indian cities tabulated below, sunrise on this date varies from 05:00 (Kolkata) at the eastern edge to 06:07 (Mumbai) in the west — a 67-minute difference that drives the city-by-city muhurat shift you see in the table.
For Akshaya Tritiya 2027, the central rite of मध्याह्न depends on the Vaishakha Shukla 3 being present during that window on 2027-05-08 — confirmed across 6 reference cities in this year's computation pass. Cities further east (Kolkata, Chennai) see the window open ~15-25 minutes before Delhi; cities west of Delhi (Mumbai, Pune, Bangalore) see it start later by a similar margin.
अक्षय तृतीया 2027 — शहर-वार समय
| शहर | सूर्योदय | सूर्यास्त |
|---|---|---|
| दिल्ली | 5:35 AM | 7:00 PM |
| मुंबई | 6:07 AM | 7:03 PM |
| बेंगलुरु | 5:56 AM | 6:35 PM |
| चेन्नई | 5:45 AM | 6:25 PM |
| कोलकाता | 5:00 AM | 6:06 PM |
| पुणे | 6:03 AM | 6:58 PM |
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अक्षय तृतीया — क्या करें, क्या न करें
धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु, एवं समकालीन परम्परा से।
करने योग्य
- कोई शुभ क्रय करें — स्वर्ण अक्षयता का परम्परागत प्रतीक।
- नया कार्य अथवा बड़ा संकल्प प्रारम्भ करें — परिणाम अक्षय रूप से बढ़ते हैं।
- दान करें (विशेषतया अन्न-दान) — आज दिए दान का प्रतिफल अनन्त गुणित होता है।
- चावल एवं दूध के साथ लक्ष्मी-नारायण पूजन करें।
न करें
- आज ऋण न दें — अक्षय तृतीया के दिन लिया ऋण अदेय कहा गया है।
- नकारात्मक आदतें आज न प्रारम्भ करें — वे भी "अक्षय" बन जाती हैं।
- विवाद अथवा कठोर वचन से बचें — आगामी वर्ष का स्वर निर्धारित करता है।
- थोड़ा भी दान न छोड़ें — आज की कंजूसी पर्व के आशीर्वाद को उल्टा कर देती है।
अक्षय तृतीया 2027 शुभकामनाएँ — साझा करने योग्य संदेश
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आज जो आरम्भ करते हैं वह अक्षय कहा गया है। आपको वह विवेक मिले कि कुछ ऐसा आरम्भ करें जो रखने योग्य हो। शुभ अक्षय तृतीया।
थोड़ा सा सोना, एक छोटा सा संकल्प जिस आदत को आप रखना चाहते हैं — दोनों आज लाभ देंगे। अक्षय तृतीया की शुभकामनाएँ।
"अक्षय" — कभी समाप्त न होने वाला। आपको वह अनुशासन मिले जो उस वस्तु के योग्य हो जो कभी क्षीण नहीं होती।
आज दिया छोटा सा दान अनन्त बार लौटता है। आपको वह विवेक मिले कि किसी ऐसे व्यक्ति को दें जिनका नाम आप कल भूल जाएँगे।
आज आप जो भी प्रारम्भ करें वह कभी क्षीण न हो। अक्षय तृतीया उस प्रथम पग का पर्व है जो चलता रहता है।
अक्षय तृतीया वर्षों में — २०२०-२०३०
पिछले एवं भविष्य के वर्षों की तिथियाँ — एक स्थान पर।
यह तिथि क्यों?
मध्याह्न नियम: जिस दिन तृतीया तिथि मध्याह्न में व्याप्त हो। अक्षय तृतीया स्वयंसिद्ध मुहूर्त दिवस है – हर क्षण शुभ है – परन्तु पूजा और स्वर्ण क्रय मध्याह्न में उत्तम।
तिथि निर्धारण नियम
मध्याह्न (दोपहर) में तिथि व्याप्त होनी चाहिए। राम नवमी और गणेश चतुर्थी जैसे त्योहारों के लिए प्रयुक्त।
स्रोत: धर्मसिन्धु एवं निर्णयसिन्धु – शास्त्रीय काल-व्याप्ति पद्धति
पूजा विधि
आवश्यक सामग्री
- सोना या चाँदी की वस्तु (छोटी भी हो – सिक्का, अँगूठी या चेन)
- तुलसी के पत्ते
- दान की वस्तुएँ (वस्त्र, भोजन, जल के बर्तन)
- विष्णु मूर्ति या चित्र
- लक्ष्मी मूर्ति या चित्र
पूजा के चरण
- 1
प्रातः – स्नान एवं संकल्प
प्रातः शुद्धि स्नान करें। स्वच्छ पीले या सफ़ेद वस्त्र पहनें। वेदी के सामने बैठकर अक्षय तृतीया पूजा और दान के लिए विधिवत्...
- 2
लक्ष्मी-विष्णु पूजा
पीले कपड़े से सजी वेदी पर लक्ष्मी-विष्णु की मूर्तियाँ या चित्र स्थापित करें। चन्दन, तुलसी पत्र (विष्णु को), पीले फूल, अक...
- 3
विष्णु बीज मन्त्र जप
तुलसी माला से विष्णु बीज मन्त्र का 108 बार जप करें। भगवान विष्णु के स्वरूप पर ध्यान केन्द्रित करें और अक्षय आशीर्वाद की ...
फल (लाभ)
अक्षय तृतीया हिन्दू पञ्चाँग की सबसे पवित्र तिथियों में से एक है। इस दिन किया गया कोई भी पुण्य कर्म – दान, पूजा, जप, नई शुरुआत – अक्षय (कभी न घटने वाला) फल देता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया पर दान सभी तीर्थों के दान के बराबर है। यही दिन है जब त्रेता युग आरम्भ हुआ, गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुईं, और कुबेर को शिव से उनका धन प्राप्त हुआ।
देवता
भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी, परशुराम
कथा एवं इतिहास
अक्षय तृतीया — वैशाख शुक्ल तृतीया — स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में से एक है: एक स्व-शुभ दिन जिसमें प्रत्येक क्षण किसी भी शुभ कार्य के लिए तैयार माना जाता है, और जिसमें शुभ-समय की पृथक् पञ्चाङ्ग-गणना की आवश्… पूरी कथा पढ़ें →कम दिखाएँ ↑
अक्षय तृतीया — वैशाख शुक्ल तृतीया — स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में से एक है: एक स्व-शुभ दिन जिसमें प्रत्येक क्षण किसी भी शुभ कार्य के लिए तैयार माना जाता है, और जिसमें शुभ-समय की पृथक् पञ्चाङ्ग-गणना की आवश्यकता नहीं। नाम स्वयं सिद्धान्त वहन करता है — अक्षय अर्थात् अविनाशी, जो क्षीण नहीं होता; तृतीया अर्थात् तीसरी तिथि। यह दिन हिन्दू पञ्चाङ्ग की किसी अन्य तिथि से अधिक सृष्टि-घटनाओं से सम्बद्ध है, और प्रत्येक कथा को दिन की अविनाशी प्रकृति के कारण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
महाभारत की पहली और सर्वाधिक प्रचलित कथा देती है। महायुद्ध और प्रिय जनों के लगभग सभी की मृत्यु के पश्चात्, व्यास गङ्गा के उद्गम पर एक वृक्ष के नीचे बैठ कर बीते क्षत्रिय-त्रासद पर विचार करने लगे। उन्होंने एक लाख श्लोकों में उसका विवरण रचने का सङ्कल्प किया — इतनी विशाल कथा कि कोई मानव-लेखक उसके श्रुति-गति के साथ नहीं चल सकता। ब्रह्मा का आह्वान किया, जिन्होंने गणेश का आह्वान करने को कहा। गणेश आये; दोनों ने अपना सम्बन्ध तय किया — गणेश वह नहीं लिखेंगे जो वे न समझें, और व्यास बिना रुके बोलेंगे। गणेश ने अपना एक दाँत तोड़ कर लेखनी बनायी। महाभारत के प्रथम श्लोक अक्षय तृतीया को बोले गये। रचना वर्षों तक चली (और व्यास जब विश्राम चाहते तो कठिन श्लोक डाल देते, यह जान कर कि गणेश को रुक कर सोचना ही पड़ेगा), किन्तु जिस दिन वह आरम्भ हुई वह दिन मानव-साहित्य की दीर्घतम कृति के जन्म-दिवस के रूप में मनाया जाता है — एक कृति जो अठारह सौ वर्षों में क्षीण नहीं हुई, अतः अक्षय है।
दूसरी कथा त्रेतायुग की है। पुराण घटते धर्म-पूर्णता के चार युग वर्णन करते हैं — सत्य (पूर्ण), त्रेता (तीन-चौथाई), द्वापर (अर्ध), कलि (चौथाई)। सत्य से त्रेता का सङ्क्रमण इसी अक्षय तृतीया को हुआ कहा जाता है; अतः यह दिन एक नये चक्र का काल-आरम्भ है, और इस दिन आरम्भ किया गया कोई भी कार्य उस नये आरम्भ का आवेग वहन करता है। विष्णु के वामन और परशुराम अवतार दोनों अक्षय तृतीया पर रखे जाते हैं — परशुराम इस दिन ऋषि जमदग्नि और रेणुका के यहाँ जन्मे, क्षत्रिय-धर्म की दीर्घ अवनति के बाद उसके पुनःस्थापन के लिए। अनेक क्षेत्रों में अक्षय तृतीया के साथ परशुराम जयन्ती भी मनायी जाती है।
तीसरी कथा गृह और अन्नपूर्णा से सम्बद्ध है। मार्कण्डेय पुराण पाण्डवों के बारह-वर्षीय वनवास का वर्णन करता है, जिसमें प्रतिदिन आने वाले ऋषियों की लम्बी पंक्ति को भोजन कराने की कठिनाई ने युधिष्ठिर के अनुशासन को भी परखा। कृष्ण स्वयं उनके पास आये और द्रौपदी को एक ताम्र-पात्र दिया — अक्षय पात्र — जो असीमित भोजन उत्पन्न करता जब तक द्रौपदी ने अपने दिवस का अन्तिम ग्रास न खाया हो। पात्र अक्षय तृतीया पर दिया गया, और वनवास के दीर्घ वर्षों में बिना क्षीणता के भोजन देता रहा। यहीं से इस दिन की दीर्घ परम्परा है — गरीबों को खिलाना और अन्न दान करना (अन्नदान) — जो दिन की प्रकृति के साथ सर्वाधिक मेल खाता दानकर्म है। जो अक्षय तृतीया को अन्न में दिया जाता है, वह अक्षय रूप में लौटता है।
चौथी कथा सुदामा की है। भागवत पुराण कृष्ण के बाल-सखा सुदामा का वर्णन करता है, जो वयस्कावस्था में निर्धनता में आ गये थे। पत्नी ने उन्हें द्वारका जा कर कृष्ण से सहायता माँगने को मनाया। सुदामा, अपनी दशा से लज्जित, जो था वह ले गये — कपड़े के कोने में बँधा पोहे का एक छोटा बण्डल — और द्वारका के राजमहल के द्वार पर पहुँचे। कृष्ण ने उन्हें तत्क्षण पहचान कर सान्दीपनि-आश्रम के सखा के रूप में आलिङ्गन किया, अपने हाथों से उनके पाँव धोये, पोहा लिया और बड़े सन्तोष से खाया, और सुदामा से कुछ नहीं पूछा। सुदामा अपनी निर्धनता का उल्लेख करने में अत्यन्त लज्जित होने के कारण खाली हाथ लौटे — और घर आ कर पाया कि उनकी कुटिया महल में परिवर्तित हो गयी, पत्नी सुन्दर वस्त्रों में, बच्चे पुष्ट, आँगन गायों से भरा। कृष्ण ने बिना माँगे दिया था; बिना देते दिखे दिया था। सुदामा-कथा अक्षय तृतीया पर इसलिए सुनायी जाती है क्योंकि यह वह दिन है जब जो दिया जाता है वह अविनाशी रूप में लौटता है — किन्तु तभी जब देना स्वयं अक्षय-निःस्वार्थ हो।
पाँचवीं कथा कुबेर की है। ब्रह्म पुराण कुबेर का वर्णन करता है, धन-स्वामी पद से पूर्व, शिव-भक्ति-निरत एक साधारण गृहस्थ के रूप में। उन्होंने इस दिन दीर्घ तपस्या की और शिव से लोकों के कोषाध्यक्ष और यक्ष-स्वामी का पद प्राप्त किया। अतः अक्षय तृतीया वह दिन है जब लक्ष्मी या कुबेर के लिए कोई गृह-अर्पण दीर्घकालीन समृद्धि को स्थिर करता है।
इस दिन स्वर्ण-क्रय की प्रथा इन सब परम्पराओं के मिलन से उतरी है: स्वर्ण वह धातु है जो मलिन नहीं होती — अपने भौतिक स्वभाव में अक्षय — और जो स्वयंसिद्ध मुहूर्त पर खरीदा जाता है वह उस मुहूर्त की स्थिरता को गृह में ले आता है। पुराण जिस गहरी प्रथा पर अधिक बल देते हैं वह है अन्नदान — अन्यों को खिलाना — क्योंकि इस दिन दिया गया अन्न गुणित होकर लौटता है। दिवस यह सिखाता है कि अक्षय वह नहीं जो ताले में रखा हो; अक्षय वह है जो अन्यों को दिया जाये।
कैसे मनाएँ
सोना, चाँदी या नयी सम्पत्ति खरीदें – इस दिन प्राप्त वस्तु अक्षय (अविनाशी) होती है। दान करें, अन्नदान करें। नए कार्य, निवेश या गृहप्रवेश आरम्भ करें।
महत्व
अक्षय तृतीया हिन्दू कैलेंडर के सबसे शुभ दिनों में से एक है – प्रत्येक क्षण मुहूर्त है, अलग शुभ मुहूर्त की आवश्यकता नहीं। यह स्वयंसिद्ध मुहूर्त दिवस है।
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