अपरा एकादशी 2029
अपरा एकादशी 2029 का पर्व शनिवार, शनिवार, 7 जुलाई 2029.
अपरा एकादशी 2029 की सटीक तिथि, पूजा मुहूर्त व शहर-वार समय
प्रमुख जानकारी
त्योहार की तिथि
शनिवार, 7 जुलाई 2029
2029 पंचांग संदर्भ
वार
शनिवार
विक्रम संवत्
2086
शक संवत्
1951
इस वर्ष अपरा एकादशी शनिवार को पड़ रहा है, 2028 (2028-06-18) से 19 दिन बाद — सामान्य चन्द्र-पंचांग बदलाव।
Falling on a Saturday brings a Shani emphasis — ancestral rites and black-sesame offerings carry extra weight, mitigating Shani's shadow.
The 2028 observance fell on Sunday, 2028-06-18 — this year arrives 19 days later in the Gregorian calendar, the Adhika-masa pattern when an intercalary lunar month pushes the cycle forward.
Looking ahead to 2030, Apara Ekadashi will fall on Tuesday, 2030-06-25 (12 days earlier than this year). So planning ritual schedules across years means anchoring to the tithi rather than the Gregorian date.
Astronomical context for Apara Ekadashi 2029
On Saturday, July 7, 2029, sunrise in Delhi (the reference city for this page) falls at 05:29 IST and sunset at 19:22 IST — a daylight span of 13h 53m. Across the six pan-Indian cities tabulated below, sunrise on this date varies from 04:57 (Kolkata) at the eastern edge to 06:06 (Mumbai) in the west — a 69-minute difference that drives the city-by-city muhurat shift you see in the table.
For Apara Ekadashi 2029, the central rite of उदय तिथि (सूर्योदय) depends on the festival tithi being present during that window on 2029-07-07 — confirmed across 6 reference cities in this year's computation pass. Cities further east (Kolkata, Chennai) see the window open ~15-25 minutes before Delhi; cities west of Delhi (Mumbai, Pune, Bangalore) see it start later by a similar margin.
अपरा एकादशी 2029 — शहर-वार समय
| शहर | सूर्योदय | सूर्यास्त |
|---|---|---|
| दिल्ली | 5:29 AM | 7:22 PM |
| मुंबई | 6:06 AM | 7:20 PM |
| बेंगलुरु | 5:58 AM | 6:50 PM |
| चेन्नई | 5:47 AM | 6:39 PM |
| कोलकाता | 4:57 AM | 6:25 PM |
| पुणे | 6:03 AM | 7:15 PM |
यह तिथि क्यों?
Apara Ekadashi उदय तिथि नियम का पालन करता है – जिस दिन आवश्यक तिथि सूर्योदय के समय व्याप्त हो, उस दिन त्योहार मनाया जाता है। यह धर्मसिन्धु का सामान्य नियम है।
देवता
भगवान विष्णु (त्रिविक्रम रूप, बद्ध की मुक्ति)
कथा एवं इतिहास
राजा महीध्वज के दुष्ट छोटे भाई वज्रध्वज ने सिंहासन के लिए उन्हें मार पीपल वृक्ष के नीचे गाड़ दिया। महीध्वज की आत्मा उस वृक्ष को सताती प्रेत बनी। ऋषि धौम्य ने पास से गुजरते समय प्रेत की दशा पहचानी और ज… पूरी कथा पढ़ें →कम दिखाएँ ↑
राजा महीध्वज के दुष्ट छोटे भाई वज्रध्वज ने सिंहासन के लिए उन्हें मार पीपल वृक्ष के नीचे गाड़ दिया। महीध्वज की आत्मा उस वृक्ष को सताती प्रेत बनी। ऋषि धौम्य ने पास से गुजरते समय प्रेत की दशा पहचानी और ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का व्रत किया, पुण्य मृत राजा को दिया। प्रेत मुक्त हो उठ गया। पद्म पुराण में यह कथा है कि यह व्रत न केवल साधक को बल्कि पूर्वजों और बद्ध आत्माओं को भी मुक्त करता है।
कैसे मनाएँ
किसी ज्ञात मृत आत्मा की मुक्ति के विशिष्ट संकल्प सहित एकादशी व्रत रखें (हाल में मृत्यु या पूर्वज जिनके मरणोत्तर संस्कार अपूर्ण थे)। तिल और जल अर्पण से विष्णु पूजा। विष्णु सहस्रनाम पाठ और यथोचित पिण्डदान। नाम लेकर मृत के लिए प्रार्थना का अनुरोध करते हुए ब्राह्मणों को दान। यह शक्तिशाली पितृ-मुक्ति व्रत है।
महत्व
अपरा = "असीम / अमाप्य" — इस व्रत का पुण्य अनन्त माना जाता है, विशेषकर दूसरों की मुक्ति के लिए अर्पित किये जाने पर। विशिष्ट गुण: यह उन कुछ एकादशियों में से है जहाँ पुण्य मृत या बद्ध आत्माओं को अंतरित किया जा सकता है (परसङ्क्रम)। अचानक या अशान्त मृत्यु से ग्रस्त परिवारों, पितृ पक्ष पालन के साथ, या पुरोहितों से पितृ दोष परामर्श के बाद बहुधा रखी जाती है।
व्रत
एकादशी व्रत – अन्न/दाल वर्जित। नाम सहित मृत आत्मा को पुण्य अंतरण पारम्परिक विशेषता। द्वादशी प्रातः पारण।
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