हरतालिका तीज 2030
हरतालिका तीज 2030 की सटीक तिथि, पूजा मुहूर्त व शहर-वार समय
प्रमुख जानकारी
त्योहार की तिथि
शनिवार, 31 अगस्त 2030
2030 पंचांग संदर्भ
वार
शनिवार
विक्रम संवत्
2087
शक संवत्
1952
इस वर्ष हरतालिका तीज शनिवार को पड़ रहा है, 2029 (2029-09-10) से 10 दिन पहले — सामान्य चन्द्र-पंचांग बदलाव।
हरतालिका तीज 2030 — शहर-वार समय
| शहर | सूर्योदय | सूर्यास्त |
|---|---|---|
| दिल्ली | 5:58 AM | 6:44 PM |
| मुंबई | 6:23 AM | 6:54 PM |
| बेंगलुरु | 6:08 AM | 6:31 PM |
| चेन्नई | 5:57 AM | 6:21 PM |
| कोलकाता | 5:18 AM | 5:55 PM |
| पुणे | 6:19 AM | 6:50 PM |
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हरतालिका तीज — क्या करें, क्या न करें
धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु, एवं समकालीन परम्परा से।
करने योग्य
- सूर्योदय से अगले दिन प्रातः तक कठोर निर्जला व्रत रखें।
- रेत की मूर्तियों के साथ पार्वती-शिव पूजन करें — पर्व की परिभाषक विधि।
- पिछली सायं को मेहन्दी लगाएँ — तैयारी की परम्परा।
- हरी/लाल चूड़ियाँ, सिन्दूर, एवं परम्परागत वस्त्र पहनें।
न करें
- व्रत के दौरान जल न पीयें — एक बूँद भी परम्परा से व्रत भङ्ग करती है।
- दिन में न सोएँ — व्रत के अनुशासन को अक्षुण्ण रखता है।
- पति अथवा ससुराल वालों से विवाद न करें — पर्व वैवाहिक समरसता का है।
- अगले प्रातः निर्धारित समय से पूर्व व्रत न तोड़ें।
हरतालिका तीज 2030 शुभकामनाएँ — साझा करने योग्य संदेश
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पार्वती ने सुपात्र की प्रतीक्षा की, उपलब्ध की नहीं। आज व्रत रखने वाली प्रत्येक स्त्री को वह धैर्य मिले जिसने उन्हें शिव दिलाए। शुभ हरतालिका तीज।
निर्जल व्रत, पति का सम्पूर्ण दिन स्मरण। उस भक्ति का बल आपको मिले। हरतालिका तीज की शुभकामनाएँ।
एक पर्व जो पूछता है: इतनी प्रतीक्षा आप किसके लिए कर सकती हैं? आपको उत्तर मिले। हरतालिका तीज की शुभकामनाएँ।
रेत की मूर्ति, निर्जल, रात्रि भर मन में रखा पति। शुभ हरतालिका तीज।
आज व्रत रखने वाली प्रत्येक स्त्री को — प्रतीक्षा का अनुशासन स्वयं में एक अर्पण है। आपको पारणा प्रातः की कामना।
हरतालिका तीज वर्षों में — २०२०-२०३०
पिछले एवं भविष्य के वर्षों की तिथियाँ — एक स्थान पर।
यह तिथि क्यों?
मध्याह्न नियम: जिस दिन तृतीया तिथि मध्याह्न काल में व्याप्त हो, उस दिन मनाया जाता है। दिन में मिट्टी की शिव-पार्वती मूर्ति की पूजा के साथ व्रत।
तिथि निर्धारण नियम
मध्याह्न (दोपहर) में तिथि व्याप्त होनी चाहिए। राम नवमी और गणेश चतुर्थी जैसे त्योहारों के लिए प्रयुक्त।
स्रोत: धर्मसिन्धु एवं निर्णयसिन्धु – शास्त्रीय काल-व्याप्ति पद्धति
पूजा विधि
आवश्यक सामग्री
- शिव-पार्वती की मिट्टी या रेत की मूर्तियाँ
- 16 श्रृंगार की वस्तुएँ (सोलह श्रृंगार)
- केले के पत्ते (पूजा के आधार के लिए)
- फूल (मौसमी, विशेषतः चमेली और गेंदा)
- फल (मौसमी)
पूजा के चरण
- 1
प्रातः – स्नान एवं श्रृंगार
सूर्योदय से पहले उठें और शुद्धि स्नान करें। 16 श्रृंगार लगाएँ – यह तीज परम्परा का अनिवार्य भाग है। सुहागिन स्त्रियाँ ल...
- 2
मिट्टी की मूर्तियाँ बनाना
मिट्टी, रेत या गोबर से भगवान शिव (शिवलिंग रूप में) और देवी पार्वती की मूर्तियाँ बनाएँ। इन्हें फूलों से सजे केले के पत्ते...
- 3
संकल्प एवं आवाहन
मूर्तियों के सामने बैठें और निर्जला व्रत का विधिवत् संकल्प लें। आवाहन मन्त्रों से मिट्टी की मूर्तियों में शिव-पार्वती का...
व्रत फल (उपवास के लाभ)
हरतालिका तीज व्रत विवाहित स्त्रियों का सबसे पुण्यदायी व्रत माना जाता है। यह सौभाग्य (शाश्वत वैवाहिक शुभता), पति की दीर्घायु, और प्रत्येक जन्म में उसी पति के साथ पुनर्मिलन प्रदान करता है – जैसे पार्वती ने तपस्या से शिव प्राप्त किए। अविवाहित स्त्रियों को योग्य पति प्राप्त होता है।
देवता
भगवान शिव एवं देवी पार्वती
कथा एवं इतिहास
जब देवी पार्वती के पिता हिमालय ने उनका विवाह विष्णु से तय किया, पार्वती विचलित हुईं क्योंकि उन्होंने केवल शिव से विवाह का संकल्प लिया था। उनकी सखी ने उन्हें हर लिया – "हरतालिका" का अर्थ है "सखी का अ… पूरी कथा पढ़ें →कम दिखाएँ ↑
जब देवी पार्वती के पिता हिमालय ने उनका विवाह विष्णु से तय किया, पार्वती विचलित हुईं क्योंकि उन्होंने केवल शिव से विवाह का संकल्प लिया था। उनकी सखी ने उन्हें हर लिया – "हरतालिका" का अर्थ है "सखी का अपहरण करने वाली"। घने वन में पार्वती ने मिट्टी का शिवलिंग बनाकर कठोर तपस्या की। शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार किया।
कैसे मनाएँ
महिलाएँ भाद्रपद शुक्ल तृतीया को कठोर निर्जला व्रत रखती हैं। मिट्टी या रेत से शिव-पार्वती की मूर्ति बनाकर मध्याह्न काल में फूल, बेलपत्र और फलों से पूजा करती हैं। रात भर जागरण करती हैं। अगली सुबह मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है। अविवाहित कन्याएँ अच्छे वर के लिए और विवाहित महिलाएँ सौभाग्य के लिए व्रत रखती हैं।
महत्व
हरतालिका तीज हिन्दू महिलाओं का सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक है, विशेषकर उत्तर भारत, महाराष्ट्र और राजस्थान में। यह पार्वती की शिव के प्रति अटल भक्ति और स्त्री संकल्प की शक्ति का उत्सव है। दाम्पत्य सुख और पति की दीर्घायु के लिए अत्यन्त शक्तिशाली व्रत माना जाता है।
व्रत
सूर्योदय से अगली सुबह तक कठोर निर्जला व्रत। हिन्दू परम्परा के सबसे कठोर स्त्री व्रतों में से एक। मिट्टी की शिव-पार्वती मूर्तियों के विसर्जन के बाद पारण।