होली 2026
होली 2026 का पर्व मंगलवार, मंगलवार, 3 मार्च 2026. तिथि: phalguna shukla 15.
होली 2026 की सटीक तिथि, पूजा मुहूर्त व शहर-वार समय
प्रमुख जानकारी
त्योहार की तिथि
मंगलवार, 3 मार्च 2026
2026 पंचांग संदर्भ
वार
मंगलवार
विक्रम संवत्
2083
शक संवत्
1948
इस वर्ष होली मंगलवार को पड़ रहा है, 2025 (2025-03-14) से 11 दिन पहले — सामान्य चन्द्र-पंचांग बदलाव।
Falling on a Tuesday gives the day a Mangal emphasis — courage-related rites and red offerings carry extra weight.
The 2025 observance fell on Friday, 2025-03-14 — this year arrives 11 days earlier in the Gregorian calendar, the familiar 11-day shift of the unmodified lunar year.
Looking ahead to 2027, Holi will fall on Monday, 2027-03-22 (19 days later than this year). So planning ritual schedules across years means anchoring to the tithi rather than the Gregorian date.
Astronomical context for Holi 2026
On Tuesday, March 3, 2026, sunrise in Delhi (the reference city for this page) falls at 06:44 IST and sunset at 18:22 IST — a daylight span of 11h 38m. Across the six pan-Indian cities tabulated below, sunrise on this date varies from 05:56 (Kolkata) at the eastern edge to 06:56 (Mumbai) in the west — a 60-minute difference that drives the city-by-city muhurat shift you see in the table.
For Holi 2026, the central rite of उदय तिथि (सूर्योदय) depends on the Phalguna Shukla 15 being present during that window on 2026-03-03 — confirmed across 6 reference cities in this year's computation pass. Cities further east (Kolkata, Chennai) see the window open ~15-25 minutes before Delhi; cities west of Delhi (Mumbai, Pune, Bangalore) see it start later by a similar margin.
होली 2026 — शहर-वार समय
| शहर | सूर्योदय | सूर्यास्त |
|---|---|---|
| दिल्ली | 6:44 AM | 6:22 PM |
| मुंबई | 6:56 AM | 6:44 PM |
| बेंगलुरु | 6:34 AM | 6:28 PM |
| चेन्नई | 6:23 AM | 6:17 PM |
| कोलकाता | 5:56 AM | 5:40 PM |
| पुणे | 6:52 AM | 6:40 PM |
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होली — क्या करें, क्या न करें
धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु, एवं समकालीन परम्परा से।
करने योग्य
- सिन्थेटिक रसायनिक रंगों के स्थान पर प्राकृतिक (गुलाल, हर्बल) रंगों का प्रयोग करें।
- रंगों की पहली मुट्ठी पैर छूकर बड़ों को अर्पित करें।
- इस वर्ष जिनसे कोई विवाद हुआ हो, उनसे आज सुलह करें।
- ठंडाई, गुजिया अथवा अन्य परम्परागत मिठाई पड़ोसियों के साथ बाँटें।
- खेलने से पहले त्वचा एवं केशों पर सरसों या नारियल तेल लगाएँ — रंग आसानी से निकलते हैं।
- टिकाऊ काष्ठ से होलिका दहन एवं भुने अन्न का अर्पण — अनुष्ठान का समापन।
न करें
- सहमति न देने वाले व्यक्ति या अशक्तजनों पर रंग न डालें।
- आँखों के निकट, भोजन में, एवं पशुओं पर रंग न लगाएँ।
- भाँग का अधिक सेवन न करें — संयमित मात्रा में ही, वाहन चलाते समय कदापि नहीं।
- जल का अपव्यय न करें — होली में जल की खपत वैसे ही अधिक होती है।
- जो लोग दूर रहना चाहते हैं उन पर रंग न लगाएँ (बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार, शोकाकुल परिवार)।
- चलते वाहनों पर पानी-गुब्बारे न मारें — दुर्घटनाएँ सामान्य हैं।
होली 2026 शुभकामनाएँ — साझा करने योग्य संदेश
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आज आपको जो रंग ढूँढ ले, वह वही हो जिसकी कमी आप चुपचाप महसूस कर रहे थे। होली की शुभकामनाएँ।
भाँग हो या ठंडाई, बगीचा हो या बालकनी, परिवार हो या मित्र — आज की होली जिस रूप में मिले, आपको स्वच्छ करके जाए। होली मुबारक।
होलिका दहन की अग्नि उसे जला दे जो अब आपके काम का नहीं, और कल के रंग उसे रचें जो काम का है। शुभ होली।
होली वह पर्व है जो कहता है: कार्यस्थल पर खींची सीमाएँ ही एकमात्र सीमाएँ नहीं। आपको बिना अपराधबोध के अवकाश की शुभकामना।
इस वर्ष जिसने आपके साथ सद्भाव रखा हो, उस पर रंग डालें। होली एक ऐसी कृतज्ञता है जो रङ्ग छोड़ती है।
होलिका दहन एवं होली — पर्व क्रम
फाल्गुन पूर्णिमा की होलिका दहन की रात्रि एवं अगले दिन रंगों की होली — मङ्गल-प्रधान विमुक्ति एवं नवीनीकरण का द्वि-दिवसीय क्रम।
होली वर्षों में — २०२०-२०३०
पिछले एवं भविष्य के वर्षों की तिथियाँ — एक स्थान पर।
यह तिथि क्यों?
Holi उदय तिथि नियम का पालन करता है – जिस दिन आवश्यक तिथि सूर्योदय के समय व्याप्त हो, उस दिन त्योहार मनाया जाता है। यह धर्मसिन्धु का सामान्य नियम है।
पूजा विधि
आवश्यक सामग्री
- गोबर के उपले(10-15)
- लकड़ी के लट्ठे
- साबुत नारियल(1)
- नई फसल का गेहूँ
- नई फसल का जौ
पूजा के चरण
- 1
होलिका चिता निर्माण
गोबर के उपले, लकड़ी के लट्ठे और सूखी टहनियाँ इकट्ठी करें। खुले मैदान में चिता बनाएँ, बीच में एक लकड़ी का खम्भा रखें जो प...
- 2
पूजा स्थापना
चिता के पास जल का लोटा रखें। थाली में कुमकुम, अक्षत, फूल, नारियल और अन्य सामग्री सजाएँ।
- 3
संकल्प
दाहिने हाथ में जल और अक्षत लेकर, तिथि, स्थान और होलिका दहन का उद्देश्य बोलकर जल छोड़ें।
फल (लाभ)
सभी अशुभ और नकारात्मकता का विनाश (जैसे होलिका जलाई गई), आसुरी शक्तियों से रक्षा, वातावरण की शुद्धि, अत्याचार पर भक्ति की विजय का उत्सव, और आनन्द व भाईचारे से वसन्त ऋतु का स्वागत
देवता
भगवान विष्णु (प्रह्लाद के रक्षक)
कथा एवं इतिहास
होली दो पर्व एक साथ हैं — पूर्व सन्ध्या की अग्नि-रात्रि और अगला रङ्ग-दिवस — और प्रत्येक पृथक् पौराणिक कथा से जुड़ा है। पूरी कथा पढ़ें →कम दिखाएँ ↑
होली दो पर्व एक साथ हैं — पूर्व सन्ध्या की अग्नि-रात्रि और अगला रङ्ग-दिवस — और प्रत्येक पृथक् पौराणिक कथा से जुड़ा है।
रात्रि की मूल कथा प्रह्लाद की है। भागवत पुराण के अनुसार दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा से ऐसा वरदान प्राप्त किया जिसकी रचना उसने इतनी सूक्ष्मता से की कि स्वयं को मृत्यु-रहित मान लिया — न मनुष्य न पशु, न दिन न रात, न भीतर न बाहर, न शस्त्र न हस्त, न पृथ्वी न आकाश में उसका वध हो। उसने स्वयं को एकमात्र देव घोषित कर विष्णु-पूजा का निषेध कर दिया। पर उसका पुत्र प्रह्लाद बाल्यकाल से ही पिता के दरबार में विष्णु का स्मरण करता। हिरण्यकशिपु ने विष-पान, गज-घात, सर्प-दंश, पर्वत-पतन — सब प्रकार से वध का प्रयत्न किया, हर बार विष्णु ने भीतर से रक्षा की। अन्ततः उसने बहन होलिका को बुलाया, जिसे अग्नि-निरोधक वस्त्र का वर प्राप्त था। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता में बैठी। धर्म की वायु पलटी: वस्त्र होलिका के कन्धे से उतर कर प्रह्लाद को आच्छादित कर गया, और जिसका वर तभी काम करता था जब वह अकेली बैठे, वह होलिका भस्म हो गयी जबकि बालक अक्षत बाहर आ गया। आगे विष्णु नृसिंह रूप में स्तम्भ से प्रकट हुए — न नर न मृग — सन्ध्या काल में (न दिन न रात), हिरण्यकशिपु को गोद में लेकर (न भीतर न बाहर), देहरी पर (न भू न नभ), नखों से (न शस्त्र न हस्त) उसका विदारण किया। फाल्गुन पूर्णिमा की पूर्व सन्ध्या को होलिका दहन उसी अहङ्कार के दहन और भक्त की रक्षा का स्मरण है।
रङ्ग-दिवस की कथा वृन्दावन से है, विष्णु पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित। बाल कृष्ण, पूतना के विष से श्यामल वर्ण, माता यशोदा से पूछते हैं कि गौरी राधा उनसे इतनी भिन्न क्यों है। यशोदा हँस कर कहती हैं — जिस रङ्ग में चाहो उसका मुख रङ्ग दो। कृष्ण आँगन से गुलाल लेकर राधा और सखियों पर डालते हैं, जो उन्हें बरसाने की गलियों में लाठियों और जल से दौड़ाती हैं। इसी प्रसंग से बरसाने और नन्दगाँव की लट्ठमार होली प्रवर्तित हुई, और व्यापक वृन्दावनी परम्परा से रङ्ग और जल फेंकने की प्रथा भारत भर में फैली।
तीसरी कथा, प्रायः विस्मृत, शिव पुराण से है। कामदेव को देवताओं ने शिव-तपस्या भङ्ग करने भेजा ताकि शिव-पार्वती से एक पुत्र हो जो तारकासुर का वध करे। कामदेव ने पुष्प-बाण छोड़ा; शिव ने तृतीय नेत्र खोला, और काम उसी फाल्गुन पूर्णिमा को भस्म हो गया। इसलिए होली में एक मौन स्मरण है — जो अग्नि होलिका को भस्म करती है, वही आन्तरिक आसक्ति को भी भस्म करती है।
इन तीन कथाओं की यह लड़ी दो-दिवसीय आकार समझाती है: रात्रि की अग्नि शुद्धि और धर्म-विजय का स्मरण है; दिन के रङ्ग उसके पश्चात् की मुक्ति का उत्सव — चिता से बाहर आते प्रह्लाद की मुक्ति, समान रूप से श्यामल और समान रूप से प्रिय कृष्ण की मुक्ति, और एक ऐसे समाज की मुक्ति जहाँ ऊँच-नीच सब समान गुलाल से एक हो जाते हैं।
कैसे मनाएँ
पूर्व संध्या: होलिका दहन – अलाव जलाएँ, परिक्रमा करें। अगले दिन: रंगों से खेलें (गुलाल, पिचकारी), ठण्डाई पिएँ, गुजिया खाएँ। मित्रों और परिवार से मिलें।
महत्व
अच्छाई (प्रह्लाद की भक्ति) की बुराई (हिरण्यकशिपु के अहंकार) पर विजय। वसन्त, नवीनता और सामाजिक एकता का उत्सव।
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