षटतिला एकादशी 2026
षटतिला एकादशी 2026 का पर्व शुक्रवार, शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026.
षटतिला एकादशी 2026 की सटीक तिथि, पूजा मुहूर्त व शहर-वार समय
प्रमुख जानकारी
त्योहार की तिथि
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026
2026 पंचांग संदर्भ
वार
शुक्रवार
विक्रम संवत्
2083
शक संवत्
1948
इस वर्ष षटतिला एकादशी शुक्रवार को पड़ रहा है, 2025 (2025-02-24) से 11 दिन पहले — सामान्य चन्द्र-पंचांग बदलाव।
Falling on a Friday gives the day a Shukra emphasis — relationship-related rites and white/silver offerings carry extra weight, traditionally favourable for women's vratas.
The 2025 observance fell on Monday, 2025-02-24 — this year arrives 11 days earlier in the Gregorian calendar, the familiar 11-day shift of the unmodified lunar year.
Looking ahead to 2027, Shattila Ekadashi will fall on Thursday, 2027-03-04 (19 days later than this year). So planning ritual schedules across years means anchoring to the tithi rather than the Gregorian date.
Astronomical context for Shattila Ekadashi 2026
On Friday, February 13, 2026, sunrise in Delhi (the reference city for this page) falls at 07:01 IST and sunset at 18:09 IST — a daylight span of 11h 8m. Across the six pan-Indian cities tabulated below, sunrise on this date varies from 06:09 (Kolkata) at the eastern edge to 07:07 (Mumbai) in the west — a 58-minute difference that drives the city-by-city muhurat shift you see in the table.
For Shattila Ekadashi 2026, the central rite of उदय तिथि (सूर्योदय) depends on the festival tithi being present during that window on 2026-02-13 — confirmed across 6 reference cities in this year's computation pass. Cities further east (Kolkata, Chennai) see the window open ~15-25 minutes before Delhi; cities west of Delhi (Mumbai, Pune, Bangalore) see it start later by a similar margin.
षटतिला एकादशी 2026 — शहर-वार समय
| शहर | सूर्योदय | सूर्यास्त |
|---|---|---|
| दिल्ली | 7:01 AM | 6:09 PM |
| मुंबई | 7:07 AM | 6:37 PM |
| बेंगलुरु | 6:42 AM | 6:24 PM |
| चेन्नई | 6:32 AM | 6:14 PM |
| कोलकाता | 6:09 AM | 5:31 PM |
| पुणे | 7:03 AM | 6:34 PM |
यह तिथि क्यों?
Shattila Ekadashi उदय तिथि नियम का पालन करता है – जिस दिन आवश्यक तिथि सूर्योदय के समय व्याप्त हो, उस दिन त्योहार मनाया जाता है। यह धर्मसिन्धु का सामान्य नियम है।
देवता
भगवान विष्णु (तिल विशेष अर्पण)
कथा एवं इतिहास
भविष्य पुराण में पुलस्त्य ऋषि दालभ्य को षट्तिला व्रत बताते हैं। एक धनी ब्राह्मणी बाह्य शुद्ध थी किन्तु कभी दान नहीं करती थी — उसके व्रतों का अल्प पुण्य ही मिलता। मृत्यु पर वह दरिद्र होकर पुनर्जन्म पाय… पूरी कथा पढ़ें →कम दिखाएँ ↑
भविष्य पुराण में पुलस्त्य ऋषि दालभ्य को षट्तिला व्रत बताते हैं। एक धनी ब्राह्मणी बाह्य शुद्ध थी किन्तु कभी दान नहीं करती थी — उसके व्रतों का अल्प पुण्य ही मिलता। मृत्यु पर वह दरिद्र होकर पुनर्जन्म पायी। स्वयं विष्णु छद्म रूप में आये और छह तिल-प्रयोग (स्नान, मर्दन, हवन, तर्पण, भोजन, दान) माघ कृष्ण एकादशी पर अनगिनत पुण्य देते हैं — यह सिखाया। उसने व्रत किया और दारिद्र्य से मुक्त हो समृद्ध जन्म प्राप्त हुआ।
कैसे मनाएँ
व्रत की परिभाषा तिल (तिला) के छह (षट्) प्रयोगों से है: (1) तिल मिले जल में स्नान, (2) तिल तेल मर्दन, (3) हवन में तिल अर्पण, (4) तिल मिश्रित तर्पण, (5) पारण पर अल्प तिल सेवन, (6) ब्राह्मणों और निर्धनों को तिल दान। शेष एकादशी व्रत यथावत्। यह एकमात्र एकादशी है जिसमें तिल विशेष विधान है।
महत्व
"दान एकादशी" — पुण्य संचय कर देने में बाधा का आध्यात्मिक उपचार। तिल दान दान-विघ्न के विसर्जन का प्रतीक। ठण्डे क्षेत्रों में विशेष रूप से रखी जाती है जहाँ तिल तेल और गुड़-तिल मिठाई गर्मी देते हैं — व्यावहारिक दान विधि से मिलता है। दारिद्र्य और उसके कर्म चक्र का नाश। माघ माह का समय व्यापक तीर्थ-दान काल से जुड़ा है।
व्रत
एकादशी व्रत – अन्न/दाल वर्जित, किन्तु तिल छह विहित प्रयोगों में अनिवार्य। द्वादशी प्रातः पारण।
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