वरूथिनी एकादशी 2030
वरूथिनी एकादशी 2030 का पर्व सोमवार, सोमवार, 27 मई 2030.
वरूथिनी एकादशी 2030 की सटीक तिथि, पूजा मुहूर्त व शहर-वार समय
प्रमुख जानकारी
त्योहार की तिथि
सोमवार, 27 मई 2030
2030 पंचांग संदर्भ
वार
सोमवार
विक्रम संवत्
2087
शक संवत्
1952
इस वर्ष वरूथिनी एकादशी सोमवार को पड़ रहा है, 2029 (2029-06-07) से 11 दिन पहले — सामान्य चन्द्र-पंचांग बदलाव।
Falling on a Monday brings a Chandra emphasis — lunar rites and milk/rice offerings carry extra weight, especially for the moon-sensitive nakshatras.
The 2029 observance fell on Thursday, 2029-06-07 — this year arrives 11 days earlier in the Gregorian calendar, the familiar 11-day shift of the unmodified lunar year.
Looking ahead to 2031, Varuthini Ekadashi will fall on Friday, 2031-05-16 (11 days earlier than this year). So planning ritual schedules across years means anchoring to the tithi rather than the Gregorian date.
Astronomical context for Varuthini Ekadashi 2030
On Monday, May 27, 2030, sunrise in Delhi (the reference city for this page) falls at 05:25 IST and sunset at 19:11 IST — a daylight span of 13h 46m. Across the six pan-Indian cities tabulated below, sunrise on this date varies from 04:52 (Kolkata) at the eastern edge to 06:00 (Mumbai) in the west — a 68-minute difference that drives the city-by-city muhurat shift you see in the table.
For Varuthini Ekadashi 2030, the central rite of उदय तिथि (सूर्योदय) depends on the festival tithi being present during that window on 2030-05-27 — confirmed across 6 reference cities in this year's computation pass. Cities further east (Kolkata, Chennai) see the window open ~15-25 minutes before Delhi; cities west of Delhi (Mumbai, Pune, Bangalore) see it start later by a similar margin.
वरूथिनी एकादशी 2030 — शहर-वार समय
| शहर | सूर्योदय | सूर्यास्त |
|---|---|---|
| दिल्ली | 5:25 AM | 7:11 PM |
| मुंबई | 6:00 AM | 7:10 PM |
| बेंगलुरु | 5:52 AM | 6:41 PM |
| चेन्नई | 5:41 AM | 6:30 PM |
| कोलकाता | 4:52 AM | 6:15 PM |
| पुणे | 5:57 AM | 7:05 PM |
यह तिथि क्यों?
Varuthini Ekadashi उदय तिथि नियम का पालन करता है – जिस दिन आवश्यक तिथि सूर्योदय के समय व्याप्त हो, उस दिन त्योहार मनाया जाता है। यह धर्मसिन्धु का सामान्य नियम है।
देवता
भगवान विष्णु (वराह-रक्षक रूप)
कथा एवं इतिहास
सूर्यवंशी राजा माँधाता, राम के पूर्वज, अपनी तपस्या के लिए प्रसिद्ध थे। एक तप-काल में जंगली रीछ ने आक्रमण कर उनका पैर खाना आरम्भ किया। रक्तस्राव और पीड़ा में भी वे तपस्या भंग न करते हुए ध्यान में स्थिर… पूरी कथा पढ़ें →कम दिखाएँ ↑
सूर्यवंशी राजा माँधाता, राम के पूर्वज, अपनी तपस्या के लिए प्रसिद्ध थे। एक तप-काल में जंगली रीछ ने आक्रमण कर उनका पैर खाना आरम्भ किया। रक्तस्राव और पीड़ा में भी वे तपस्या भंग न करते हुए ध्यान में स्थिर रहे। विष्णु ने इस धैर्य से प्रसन्न होकर प्रकट हो रीछ को मारा, किन्तु राजा का पैर नष्ट हो गया। विष्णु ने उन्हें वैशाख कृष्ण एकादशी व्रत बताया जिससे शरीर पुनः पूर्ण हो। माँधाता ने व्रत किया, पैर पुनः उत्पन्न हुआ। भविष्योत्तर पुराण में यह कथा है।
कैसे मनाएँ
एकादशी व्रत रखें। यदि सम्भव हो तो वराह (शूकर) रूप के लक्षणों से विष्णु पूजा — सम्बन्ध प्रतीकात्मक है (शूकर का घाव जो शूकर रूप पुण्य बना)। विष्णु सहस्रनाम और माँधाता कथा पाठ। चोट या रोग से उबरने, शारीरिक शक्ति की पुनः प्राप्ति, या रोग मुक्ति यात्रा में रत साधकों द्वारा विशेष रूप से रखी जाती है। रोगियों को चिकित्सा सामग्री या भोजन दान।
महत्व
वरूथिनी = "रक्षा / आवरण" — क्षतिग्रस्त को पुनर्स्थापित और भविष्य की हानि से रक्षा। माँधाता कथा का कोमल भाव: महान आत्माएँ भी दुर्घटनाएँ झेलती हैं; स्थायी धर्म (तप न त्यागने का संकल्प) अन्ततः दैवी हस्तक्षेप आकर्षित करता है। पुनर्स्थापना के लिए विशेष शक्तिशाली — स्वास्थ्य की, दुर्भाग्य से खोयी प्रतिष्ठा की, बाह्य आघातों से तनावग्रस्त सम्बन्धों की। नाम का "कवच" अर्थ विष्णु के रक्षा कवच के आह्वान से जुड़ता है।
व्रत
एकादशी व्रत – अन्न/दाल वर्जित। रोग या चोट से उबरने वालों के लिए विशेष उपयुक्त। द्वादशी प्रातः पारण।