दीपावली 2029
दीपावली 2029 की सटीक तिथि, पूजा मुहूर्त व शहर-वार समय
प्रमुख जानकारी
त्योहार की तिथि
सोमवार, 5 नवंबर 2029
Lakshmi Puja (Pradosh Kaal) (दिल्ली)
5:49 PM – 7:15 PM
2029 पंचांग संदर्भ
वार
सोमवार
विक्रम संवत्
2086
शक संवत्
1951
इस वर्ष दीपावली सोमवार को पड़ रहा है, 2028 (2028-10-17) से 19 दिन बाद — सामान्य चन्द्र-पंचांग बदलाव।
दीपावली 2029 — शहर-वार समय
| शहर | सूर्योदय | सूर्यास्त | पूजा मुहूर्त |
|---|---|---|---|
| दिल्ली | 6:35 AM | 5:33 PM | 5:49 PM – 7:15 PM |
| मुंबई | 6:40 AM | 6:03 PM | 6:19 PM – 7:45 PM |
| बेंगलुरु | 6:14 AM | 5:51 PM | 6:08 PM – 7:34 PM |
| चेन्नई | 6:03 AM | 5:41 PM | 5:57 PM – 7:23 PM |
| कोलकाता | 5:43 AM | 4:57 PM | 5:13 PM – 6:39 PM |
| पुणे | 6:36 AM | 6:00 PM | 6:16 PM – 7:42 PM |
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दीपावली — क्या करें, क्या न करें
धर्मसिन्धु, निर्णयसिन्धु, एवं समकालीन परम्परा से।
करने योग्य
- सूर्यास्त से पूर्व घर की सम्पूर्ण सफाई करें — लक्ष्मी वहीं प्रवेश करती हैं जहाँ व्यवस्था हो।
- घर के प्रत्येक कक्ष में दीप जलाएँ — शौचालय, भण्डार सहित (कोई अन्धकारपूर्ण कोना न रहे)।
- प्रदोष काल (सूर्यास्त के लगभग दो घंटे बाद तक) में लक्ष्मी-गणेश पूजन करें।
- नई बही-खाता / लेखापुस्तकें खोलें — चोपड़ा पूजन का प्रतीकात्मक शुभारम्भ।
- वस्त्र, अन्न, अथवा धन का दान करें ज़रूरतमन्द को — लक्ष्मी साझा करने को आशीर्वाद देती हैं।
- नये अथवा स्वच्छ पारम्परिक वस्त्र पहनें — स्वर्ण, लाल अथवा पीला रंग शुभ।
न करें
- जुआ खेलने की प्रचलित प्रथा होते हुए भी इसे टालें — यह अलक्ष्मी को आमन्त्रित करता है।
- पुराने किन्तु कार्यरत घरेलू उपकरण आज न तोड़ें न त्यागें।
- विवाद में स्वर ऊँचा न करें — कलह लक्ष्मी को घर से बाहर भेजती है।
- दीपावली की रात्रि न तो उधार लें न दें — दोनों अशुभ माने गये हैं।
- अधिक पटाखे न जलाएँ — वायु प्रदूषण + लक्ष्मी बाहरी प्रकाश से अधिक भीतरी प्रकाश को प्रिय करती हैं।
- अनुष्ठान के पश्चात पूजा-वेदी अव्यवस्थित न छोड़ें — सोने से पूर्व स्वच्छ कर सम्भालें।
दीपावली 2029 शुभकामनाएँ — साझा करने योग्य संदेश
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आज रात आप जो दीप जलाएँ, वे रात्रि से अधिक दीर्घ हों — और जिस द्वार तक पहुँचें, वह स्वागत का द्वार हो। शुभ दीपावली।
आपको वही दीपावली शुभकामनाएँ जैसी आपकी दादी पहचानती थीं — स्वच्छ आँगन, भरे दीप, ताज़ी मिठाई, बच्चों की हँसी। हमारा परिवार आपके परिवार को।
इस दीपावली थोड़ा कम धुआँ, थोड़ी अधिक रोशनी। थोड़ा कम शोर, थोड़ा अधिक अर्थ। शुभ दीपावली।
नया बही खाता एक प्रविष्टि से खोलें: किसी ग्राहक का नाम जो आपके धैर्य के योग्य न था फिर भी आपने धैर्य दिखाया। शुभ दीपावली।
आज रात्रि लक्ष्मी आपके घर को देखें एवं ठहरना चुनें। आगामी वर्ष पिछले वर्ष से अधिक करुणामय हो। शुभ दीपावली।
पञ्च-दिवसीय दीपावली पर्व — पर्व क्रम
दीपावली के पाँच दिन धनतेरस से प्रारम्भ होकर भाई दूज तक चलते हैं — प्रत्येक दिन का अपना देवता, अनुष्ठान एवं ज्योतिषीय केन्द्रबिन्दु है।
दीपावली वर्षों में — २०२०-२०३०
पिछले एवं भविष्य के वर्षों की तिथियाँ — एक स्थान पर।
यह तिथि क्यों?
प्रदोष (सन्ध्या) नियम: जिस दिन अमावस्या तिथि प्रदोष काल में व्याप्त हो, उस दिन मनाया जाता है। लक्ष्मी पूजा स्थिर लग्न (वृषभ) में की जाती है।
तिथि निर्धारण नियम
प्रदोष काल (सन्ध्या समय) में तिथि व्याप्त होनी चाहिए। यह दीपावली और धनतेरस जैसे त्योहारों का प्रमुख नियम है।
स्रोत: धर्मसिन्धु एवं निर्णयसिन्धु – शास्त्रीय काल-व्याप्ति पद्धति
पूजा विधि
आवश्यक सामग्री
- नई लक्ष्मी-गणेश मूर्तियाँ या चित्र
- लाल कपड़ा (पूजा चौकी के लिए)
- सिक्के और नोट
- कमल के फूल
- अक्षत (साबुत चावल)
पूजा के चरण
- 1
तैयारी
पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करें। लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएँ। लक्ष्मी मूर्ति/चित्र बीच में पूर्वमुखी रखें, गणेश उन...
- 2
आचमन
विष्णु के नामों का उच्चारण करते हुए दाहिने हाथ से तीन बार जल का आचमन करें।
- 3
संकल्प
दाहिने हाथ में जल और अक्षत लेकर, तिथि, स्थान और लक्ष्मी-गणेश पूजा का उद्देश्य बोलकर जल छोड़ें।
फल (लाभ)
धन और समृद्धि की प्राप्ति, गरीबी और आर्थिक कठिनाइयों का निवारण, घर में लक्ष्मी का स्थायी निवास, व्यापार और करियर में सफलता, और परिवार का सम्पूर्ण कल्याण
देवता
देवी लक्ष्मी, भगवान राम, भगवान गणेश
कथा एवं इतिहास
दीपावली का पर्व कई पौराणिक परम्पराओं से जुड़ा है, जो सब एक ही चित्र पर मिलती हैं — कार्तिक अमावस्या की सबसे काली रात्रि में जलते दीप। पूरी कथा पढ़ें →कम दिखाएँ ↑
दीपावली का पर्व कई पौराणिक परम्पराओं से जुड़ा है, जो सब एक ही चित्र पर मिलती हैं — कार्तिक अमावस्या की सबसे काली रात्रि में जलते दीप।
सबसे प्रचलित कथा रामायण से है। 14 वर्ष के वनवास, रावण-वध और सीता-मोक्ष के पश्चात् श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान और विभीषण के साथ अयोध्या लौटते हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार नगर को दुल्हन की भाँति सजाया गया — हर द्वार पर तोरण, हर छत पर दीप-पंक्ति, हर मार्ग धुला और लीपा गया। दीप दो उद्देश्य साधते हैं: चन्द्रहीन रात्रि में स्वागत, और रावण की लम्बी छाया पर प्रकाश का सार्वजनिक उत्तर। इसी से दीपावली (दीपों की पंक्ति) की प्रथा भारत भर में फैली।
दूसरी महान परम्परा लक्ष्मी से सम्बन्धित है। पद्म पुराण और विष्णु पुराण में समुद्र मन्थन का वर्णन है — मन्दार पर्वत को मन्थ-दण्ड और वासुकि नाग को रज्जु बनाकर देव-असुरों ने क्षीर-सागर को मथा। चौदह रत्न प्रकट हुए: विष, कामधेनु, उच्चैःश्रवा, ऐरावत, कल्पवृक्ष, अप्सराएँ, चन्द्र, और अन्त में स्वयं लक्ष्मी कमल पर विराजमान, हाथ में वैजयन्ती माला लिए, जिसे उन्होंने विष्णु के कण्ठ में डाला। जिस रात्रि लक्ष्मी ने विष्णु का वरण किया वही दीपावली की रात्रि है — अतः सन्ध्या में महालक्ष्मी पूजन, नये बही-खाते, गृह की देहरी झाड़कर दीप जलाना ताकि वह आकर रुकें।
तीसरी परम्परा — विशेषतः दक्षिण और पश्चिम भारत में — कृष्ण द्वारा नरकासुर वध की है, जो दीपावली से पूर्व दिन नरक चतुर्दशी पर हुआ। प्राग्ज्योतिषपुर के राजा नरकासुर ने सोलह सहस्र राजकन्याओं को बन्दी बनाया था। हरिवंश और भागवत पुराण के अनुसार कृष्ण गरुड़ पर सत्यभामा के साथ आये; सत्यभामा का बाण नरक का अन्त करता है, बन्दिनी मुक्त होती हैं, और अगले प्रभात उसकी जीती हुई नगरी में दीप जलते हैं। चतुर्दशी के प्रातः अभ्यङ्ग-स्नान उन बन्दिनी कन्याओं के बन्धन-स्नान की स्मृति है।
जैनों के लिए दीपावली रात्रि महावीर का निर्वाण-दिवस है — 527 ईसा पूर्व में पावापुरी में चौबीसवें तीर्थंकर का मोक्ष। उनके आन्तरिक प्रकाश के विदा होने पर देवताओं ने बाह्य प्रकाश से जगत को आलोकित किया, और जैन उसी अमावस्या को दीप जलाकर स्मरण करते हैं। सिखों के लिए दीपावली बन्दी छोड़ दिवस है: 1619 में गुरु हरगोबिन्द ने ग्वालियर के दुर्ग से मुक्ति पाई, और अपने वस्त्र का छोर पकड़ाकर बावन हिन्दू राजाओं को साथ बाहर निकाला — इसी की स्मृति में अमृतसर का हरमन्दिर साहिब प्रकाशित किया जाता है।
चारों परम्पराओं का साझा सूत्र संयोग नहीं — कार्तिक अमावस्या का खगोलीय पठन है: वर्ष के जिस क्षण बाह्य प्रकाश न्यूनतम है, उसी क्षण प्रत्येक परम्परा कहती है कि एक आन्तरिक अथवा धार्मिक प्रकाश ने किसी अन्धकार पर विजय पायी — रावण, दारिद्र्य, नरकासुर, बन्दी-दुर्ग। देहरी पर रखा दीप अतः सजावट नहीं — यह उस महान कृत्य की गृह-पुनरावृत्ति है, घोषणा है कि परिवार ने भी आगामी वर्ष के लिए प्रकाश का पक्ष चुना है।
कैसे मनाएँ
पाँच दिनों का उत्सव: धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली (लक्ष्मी पूजा, दीप जलाएँ), गोवर्धन पूजा, भाई दूज। घर की सफाई, रंगोली, नए वस्त्र।
महत्व
प्रकाश का त्योहार – अन्धकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान, बुराई पर अच्छाई की विजय। सबसे अन्धेरी रात (अमावस्या) को प्रकाशित किया जाता है।
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